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Showing posts from 2010

क्या बदल गया बिहार?

हिटलशाही के दौर में एक कहावत बहुत मशहूर हुई थी. एक झूठ को सौ बार बोलो, वो सच हो जाएगा. और बकायदा झूठ को प्रचारित करने के लिए हिटलर ने एक मंत्री की भी नियुक्ति की थी. ताजा उदाहरण बिहार सरकार है. विकास और सुशासन की छवि, जो यहां बनी नहीं बनाई गई है, उसमें भी इसी फॅर्मूले का इस्तेमाल किया गया है. यानि, जितना विकास हुआ नहीं उससे कहीं ज्यादा इसके बारे में लोगों को बताया जा रहा है. और,बार-बार बताया जा रहा है. जाहिर है, इसके लिए मीडिया का सहारा लिया गया और जम कर विज्ञापन बांटे गए. सूबे के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार के चार साल के कार्यकाल में करीब 65 करोड रूपये से भी ज्यादा के विज्ञापन विभिन्न अखबारों और न्यूज चैनलों को बांटे गए. जाहिर है, बुलबुल भी वैसी ही नाचेगी जैसे पैसा देने वाला चाहता है. हुआ भी ऐसा ही. करोडों का विज्ञापन लेने के बाद मीडिया ने भी बिहार की ऐसी छवि बनाई मानो सचमुच बिहार अब भूखमुक्त,भयमुक्त, भ्रष्टाचरमुक्त हो गया है.मीडिया ने नीतीश कुमार की जितनी बड़ी छवि गढ़ी है, बिहार की जनता ने उससे कई गुना बड़ा जनादेश उनको दिया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार विधानसभा में...

ओबामा की भारत यात्रा बनाम अमेरिका का भविष्य

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2008 में जब पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने तब मीडिया ने उन्हें किस्मत का धनी करार दिया। खुद ओबामा ने भी इस बात को स्वीकारा, लेकिन एक सच यह भी है कि ओबामा ने व्हाइट हाउस में जिस दिन कदम रखा था उसी दिन भाग्य उनका साथ छोड़ गया था। पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश की सनक भरी नीतियों के परिणामस्वरूप इराक-अफगान युद्ध, आतंकवाद और चरमराई हुई अर्थव्यवस्था जैसी दुष्कर चुनौतियां ओबामा को विरासत में मिलीं। अमेरिकी उन्हें करिश्माई मानते हैं, इसलिए उम्मीदें का बोझ उनके कंधों पर कुछ ज्यादा ही है। ऐसा नहीं कि वह हर मोर्चे पर असफल ही रहे हैं, लेकिन आर्थिक बदहाली ने अमेरिकियों में कुछ ज्यादा ही असंतोष पैदा कर दिया है। इसमें शक नहीं कि ओबामा वादों को पूरा करने का दम रखते हैं। इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी उन्हीं के प्रयासों से हुई। बुश प्रशासन से तुलना करें तो ओबामा के निर्णय बेहतर साबित हुए हैं। रूस-अमेरिका के बीच मित्रता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, लेकिन बेरोजगार होते अमेरिकी इंतजार नहीं करना चाहते हैं और ना ही उनमे और इंतज़ार करने का दम बचा है। वे बदलाव को विकल्प के रूप में दे...

शरद यादव जी आपको हुआ क्या है?

अक्सर देखा यह गया है कि कुछ लोगों की प्रकृति या कहें प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें अच्छाई में भी खोट नजर आने लगती है। किसी सही बात की तारीफ की उम्मीद तो इनसे करना बेकार है, ये तो उसमें भी मीन-मेख निकालने से नहीं चूकते। शायद ऐसी ही प्रवृत्ति जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव की भी होती जा रही है। आजकल वे बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर देते हैं या कोई मुद्दा उठा देते हैं और बाद में उन्हें मुंह की खानी पड़ती है। अपनी इसी प्रवृति का एक नया नमूना स्वनामधन्य श्री यादव ने कल पेश किया. शरद यादव ने सोमवार को फतुआ में एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए जेडी (यू) नेता और एनडीए संयोजक शरद यादव ने गांधी परिवार पर तीखे हमले किए। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए। उन्होंने कहा, ' मोतीलाल, जवाहरलाल, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी। अब एक नया बबुआ आ गया है। वह ऐसे करता है (भाषण शुरू करने से पहले आस्तीन चढा़ने की राहुल शैली की नकल उतारते हुए)। ' यादव ने कहा, ' तुमको मालूम क्या है ? कोई कागज पर लिख कर दे देता है और तुम पढ़ देते हो। तुम्हें तो उठाकर गंगा में फेंक द...

गर्भ रुदन

मैं अजन्मी हूँ अंश तुम्हारा फिर क्यों गैर बनाते हो है मेरा क्या दोष जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो ... मै माँस-मज्जा का पिण्ड नहीं दुर्गा, लक्ष्मी औ‘ भवानी हूँ भावों के पुंज से रची नित्य रचती सृजन कहानी हूँ लड़की होना किसी पाप की निशानी तो नहीं फिर मैं तो अभी अजन्मी हूँ मत सहना मेरे लिए क्लेश मत सहेजना मेरे लिए दहेज मैं दिखा दूँगी कि लड़कों से कमतर नहीं माद्दा रखती हूँ श्मशान घाट में भी अग्नि देने का बस विनती मेरी है मुझे दुनिया में आने तो दो!!

स्त्री

क्या तुम जानते हो एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ? बता सकते हो तुम एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ? अगर नहीं तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे एक स्त्री के बारे में….? जानने की कोशिश करो पर पहले तो बदलो अपनी दृष्टि को एक पुरुष की जगह एक पुत्र, एक भाई एक पिता बनो ओढ़ता,बिछाता,और भोगता शरीर को जीता पुरुष शरीर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता उसका प्यार-दुलार,मनुहार सभी कुछ शरीर की परिधि से बंधा होता है… लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी बहुत कुछ होती है… वह होती है जननी और सृष्टा मानव जाती की वह होती है शक्ति दुर्गा, काली, लक्ष्मी, और सरस्वती शक्ति का अपूर्व भंडार जो भरता है तुम्हारी रगों में इसलिए जितना सताओगे उतना उठुगीं जितना दबाओगे उतना उगुगीं जितना बाँधोगे उतना बहूंगी जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

दिल्ली की बारिश: डर लागे गरजे बदरिया

दिल्ली की बारिश मानो लौटरी, दिल्ली तक आते-आते बादलों का हाथ तंग हो जाता है, सो सोच समझ बरसते हैं। खैर दिल्ली में हर काम में सोचा जयादा जाता है, किया कम जाता है। चाहे वो नेता हों या जनता। बादलो को यह भाषा दिल्ली में घुसते ही समझ आ जाती है फिलहाल हाल तो हमेशा की तरह यही है की बारिश न हो तो समस्या और अगर हो जाए तो दिल्ली वालों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं।दिल्ली में मंगलवार सुबह हुई झमाझम बारिश ने दिल्ली वासियों से मुरझाये चेहरे पर खुशी की लहर ला दी. सुलगती गर्मी के आतंक से झुलसती दिल्ली ने बारिश की बुंदों से राहत की सांस ली है। सुबह हुई बारिश ने तापमान काफी कम कर दिया जिसके कारण मौसम बेहद सुहावना हो गया था. पर मंगलवार के बाद हालाँकि कल बुधवार को दिल्ली में हुई बारिश की मात्र कुछ खास नहीं मात्र २१.२ मिमी ही थी, पर इतनी ही बारिश दिल्ली की सिविक एजेंसियों की तैयारी को दिखने के लिए काफी था. दिल्लीवासियों के लिए यह एक भयावह मंजर था. मेरी एक घनिष्ठ मित्र जो की एक निजी बैंक में काम करती हैं उन्होंने बताया की जैसे ही उन्होंने डीएनडी फ्लायओवर का गेट पार किया और रिंग रोड पर पहुंची तो करीबन चा...

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो

आज काफी समय बाद थोडा चैन से बैठी हूँ . एक पुराना अखबार हाथ लगा और उसमे एक खबर थी मॉडल विवेका बालाजी की आत्महत्या की. खबर पढ़ते ही मुझे याद आ गई मधुर भंडारकर की रियल टाइम मूवी फैशन की और याद आया एक किरदार कंगना रानावत ने निभाया था. मॉडलिंग की दुनिया का वह नंगा सच जो मधुर ने दिखने की कोशिश की थी एक बार फिर नग्नता की पराकाष्ठा के साथ हमारी नजरों के सामने था. विवेका बाबजी की आत्महत्या के कारणों की बात जब भी उठती है, गौतम वोरा का नाम जरूर आता है। प्राय: सभी का मानना है कि अगर गौतम ने उसके साथ बेवफाई न की होती, तो वह आज जीवित ही नहीं, स्वस्थ-प्रसन्न होती। विवेका ने आत्महत्या की रात अपनी डायरी में लिखा था, यू किल्ड मी, गौतम। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कराह लगती है जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा हो। इसीलिए सबकी सहानुभूति विवेका के साथ है। गौतम वोरा सबकी निगाह में खलनायक हो गया है। एक पत्रकार ने तो यहां तक लिख डाला कि विवेका की जान इसलिए गई कि उसने गलत आदमी का चुनाव किया था। गौतम वोरा के अलावा कोई और नहीं जानता न जान सकता है कि विवेका के साथ उसका रिश्ता क्या था? शायद विवेका भी नहीं जानती थी।...

छिछोरेपन की राजनीति

"हड़ताल विरोध जताने की एक कालविरुद्ध विधा है" विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी बंद शायद अपने उद्देश्य में सफल रहा हो और शायद उसने बढती महंगाई पर जनता के आक्रोश को अपने पक्ष में भुनाने में आंशिक सफलता भी पायी हो किन्तु यह भी एक अटल सत्य है की जब भी आर्थिक परिस्थितियोंवश बढती महंगाई पर सरकार काबू पाने में सफल होने लगती है बस तभी एन डी ए नीत विपक्ष को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद आने लगाती है. इस बार भी ऐसा ही कुछ करने की योजना बनायीं गयी और जिसका मूर्त रूप कल देखने को मिला. महंगाई के विरुद्ध विपक्ष का "भारत बंद" कितना सफल या कितना असफल रहा, यह राजनैतिक दलों के बीच विवाद का विषय जरूर हो सकता है , लेकिन आम जनता के लिए सफलता या असफलता उसे हुई दिक्कतों के पैमाने पर ही नापी जायेगी. जिन लोगों की ट्रेन या बस या फ्लाईट रद्द हो गयी या अपने शहर में ही जरूरी काम के लिए पहुँचाना नामुमकिन हो गया उन जैसे कई लोगों के लिए ऐसा बंद या उसकी सफलता या असफलता का कोई मायने नहीं होगा. वैसे लोग जो किसी न किसी प्रकार से अपने-अपने गंतव्य पर पहुँच गए और अपनी अपनी नौकरी की उनके लि...

निरुपमा हमें माफ़ करना

आज कई दिनों के बाद मन काफी उदास सा लगता है. पिछली २९ अप्रैल से जब से निरुपमा पाठक की मृत्यु या यूँ कहें की हत्या का समाचार सुना तब से जाने मन में एक अजीब सी घिन घर कर गई है. लगता है शायद रिश्तों की कीमत नहीं रह गयी है. भावनाए शुन्य में विलीन हो गयी है. ग़ालिब की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं. "हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है" शायद यही सोच रही होगी निरुपमा की आत्मा, अगर कहीं होगी तो, खुद को उसकी जगह रखकर देखती हूँ तो महसूस होता है. कैसी नारी छली जाती है अपनों के ही हाथों. निरुपमा केवल एक लड़की नहीं थी वो तो एक सोच थी. एक आम हिन्दुस्तानी लड़की की तरह जो अपने परिवार को बेहद प्यार करती थी. और प्यार करती थी उसको जिसके संग उसने जीवन बिताने के सपने देखे थे. एक आम लड़की की तरह अपने पिता के बेहद करीब और बहुत दुलारी. माँ की आँखों का तारा. भाइयों की लाडली. पर क्या सबने अपना कर्त्तव्य निभाया. वो तो अपने रिश्तों के प्रति इतनी वफादार निकली की अपने प्रेम को सामजिक मर्यादा दिलाने के लिए मात्र अपने गृहनगर चली गयी ताकि अपने जनकों की स्वनामधन्य मर्यादा को आंच ना आने दे. और उन्होंन...

कौन है जिम्मेदार?

कल दोपहर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब २० मिनट तक मौत दौड़ती रही. शिकार भागते रहे बचने की कोशिश करते रहे. खुशकिस्मत थे जो बच गए पर जिनकी किस्मत साथ ना दे पाई उनमे से एक थी ३५ वर्षीया सोनी जो हाउस मेड का काम करती थी और साल में एक बार अपने परिवार से मिलने जा रही थी. पर इस भगदड़ ने उसे अंधी मौत के जबड़ों में धकेल दिया. सोनी जैसे कई और भी अभागे रहे. पर बेशर्मी तो देखिये, मौत की इस भगदड़ के बाद रेलवे भगदड़ का ठीकरा कभी यात्रियों तो कभी इत्तिफाक पर फोड़ रही है। हादसे के बाद नींद से जागी रेलवे ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा-व्यवस्था दुरुस्त करने के दावे भी कर डाले। पर हादसे का शिकार हुए लोग रेलवे की बद इंतजामी को ही भगदड़ की वजह मानते हैं। मालूम हो कि इस हादसे में 40 से ज्यादा यात्री घायल हुए हैं। घायलों का लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायलों में 7 लोगों की हालत अभी भी गंभीर बताई जा रही है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची मौत की भगदड़ का शिकार हुए लोग घटना के घंटों बाद भी सदमे से उभर नहीं पाए हैं। लेकिन रेलवे प्रशासन की बेशर्मी इतनी ज्यादा हो गई है की आँखों देखि मक्खी भी ...

आज की गीता

मैं गीता हूँ आज के युग की क्यों कृष्ण के इन्तजार मैं बैठूं मात्र भगवत मुख वाचन के लिए अपने भाग्य पर इतराऊँ ऐठूँ बीत गया वह समय जब अर्जुन भीष्म का विपक्षी होता था छाती पर वाण चलाने से पहले शत्रु के पैर वह छूता था मर्यादाये अब शेष हुई न रहा सिद्धांत कोई बांकी गांधी, नेहरु और शास्त्री के वचनों की मात्र शेष रही झांकी पांडव न बचा राजनीति मैं कोई बस कौरव ही घुस आये हैं शकुनी साथ था उनके ये तो शकुनी के ही जाए हैं. ध्रितराष्ट्र बनी सारी जनता बस हाहाकार मचाती है द्रौपदी का चीरहरण जब होता मूक-बधिर हो जाती है कुरुक्षेत्र की इस भूमि पर अब शंखनाद मैं स्वयं करूंगी चिरनिद्रा मैं सोये युवाओं के प्राणों में स्वयं मैं ओज भरूँगी न सोचो के बस वचनमात्र से गीता के उपदेश सुनाऊँगी जो वक्त पड़ा तो थाम गांडीव स्वयं युद्धभूमि मैं भी उतर आऊँगी मैं महाभारत के इस देश मैं युगक्रांति लेकर आऊँगी

बचपन

काश के मैं बच्ची ही होती न देखती जाति धर्मं मैं न सामाजिक प्रतिष्ठा की बलि चढ़ती जब दिल करता तब मैं हंसती जब दिल दुखता मैं रो जाती काश के मैं बच्ची ही होती. न झेलती मैं छल- कपट मात्र किसी के जीवन-यापन के लिए न पाती दुर्व्यवहार किसी से सिर्फ उसके पेट-पोषण के लिए भूख लगे पर पी मात्रीक्षिर उनके गोदी में सो जाती उनके स्नेह की छाया पाती काश के में बच्ची ही होती न करती मैं आपाधापी इस अर्थयुग की अंधी दौर में मात्र सफल होने के लिए न जाती उलटे छोर मैं रिश्तों की स्नेहवर्षा में भीगकर आनद का चरम पाती मैं न दुखित होती मन ही मन देख लुप्त होती मानवता का भाव काश के सबका शैश्त्व न जाता सुख शान्ति होती सबके द्वार पर निश्चल निष्पापी बन रहते सब खुश रहती यह सृष्टि भी काश के मैं बच्ची ही होती.

आईना

खामोश व वीरान-सी आँखें हिचकियों में टूटती सांसें आसपास कुछ ढूँढती हैं जाने क्या कुछ बूझती हैं टटोलती हैं धरा पर नंगे पैरों सरक सरक कर छिलते घुटनों पर मंडराती मक्खियों को हटाते भगाते जमीन पर पड़े कंकरों पत्थरों से खुद को बचाते बचाते. पर हाथ में आता है सिर्फ गोश्त का टुकड़ा कोई इसे हिन्दू बताता कोई मुस्लमान का कहता कोई सांप्रदायिकता की संज्ञा देता कोई धर्मनिरपेक्षता का राग अलापता पर कोई तो बताओ उस दुधमुंहे मासूम का है क्या दोष भूख से तड़पती आत्मा को तृप्त करने के लिए माँ की छाती समझ वह लोथड़े को भी मुँह लगाता और मुख में दूध की जगह खून भरा आता सैकड़ों लाशों के बीच मरे- अधमरों के संग रक्त सना मुख लिए एक मासूम सा चेहरा क्या वह इस देश का भविष्य है !!

जबान संभाल के

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भाषण करते-करते बहक गए और गाली-गलौच कर गए। गाली-गलौच भी किया तो किनसे खाली बैठे लालू और मुलायम सिंह यादव से। जिनके पास उनकी खुद की राजनीति के लिए मुद्दों का अकाल पड़ा हुआ है. अब गडकरी जी ने उन्हें अपनी एडियाँ ऊँची करने के लिए राजनीति की जमीन दे दी है पर शायद इन यादव द्वय को इतनी सी बात याद नहीं रही है की एडियाँ ऊँची करने से कद ऊँचा नहीं हो जाता है. दरअसल चंडीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने लालू और मुलायमसिंह को जिन अलंकारिक शब्दों का प्रयोग किया, अगर वे तथा उनके गुर्गे भी ऐसे ही मधु भरे रसास्वादन शब्द आपको भी कह दे तो बताओ कैसे लगेगा? (वैसे मुलायम जी की और से मोहनसिंह जी ने अपना वाकतीर छोड़ दिया है) चले हैं राजनीति के बाजपेयी तथा राहुल बनने के लिए और इनके भाषण इतने निम्न स्तर के ! जोश में होश खो देना एक अच्छे लीडर शिप की पहिचान नहीं हो सकती है ! ऊंची कुर्सी वह भी देश की कभी नंबर वन कभी नंबर टू पार्टी ! मजे की बात तो यह है की यह वह पार्टी है जिसने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं, आचार-व्यवहार, भाषा का जिम्मा अपने कन्धों पर ले रखा है, उसका पार्टी अ...

कसाब का हिसाब

अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर वो जो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं। बाकी बीच के लोगों को कोई नहीं जानता। आज वह बात सही सी लग रही है। कसाब को बच्चा बच्चा इसलिए जानता है कि उसे जघन्यता की सारी हदें पार कर दीं। बहुत संभव है कि इसमें मीडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अखबारों और टीवी में उसकी खबरें खूब प्रमुखता से छापी और दिखाई गईं। और जब लगातार तीन दिन तक मुंम्बई पर आतंकी साया रहा तब तो लाइव दिखाया गया। लगातार लाइव। अब २४ घंटे में कोई समय तो ऐसा आएगा ही जब बच्चा टीवी देखेगा कि कभी नहीं देखेगा। खैर यह मुद्दा नहीं है। मूल बात कुछ और ही है। वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रह...