अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर वो जो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं। बाकी बीच के लोगों को कोई नहीं जानता। आज वह बात सही सी लग रही है। कसाब को बच्चा बच्चा इसलिए जानता है कि उसे जघन्यता की सारी हदें पार कर दीं। बहुत संभव है कि इसमें मीडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अखबारों और टीवी में उसकी खबरें खूब प्रमुखता से छापी और दिखाई गईं। और जब लगातार तीन दिन तक मुंम्बई पर आतंकी साया रहा तब तो लाइव दिखाया गया। लगातार लाइव। अब २४ घंटे में कोई समय तो ऐसा आएगा ही जब बच्चा टीवी देखेगा कि कभी नहीं देखेगा। खैर यह मुद्दा नहीं है। मूल बात कुछ और ही है।
वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रहा है कि मौत की सजा से क्या होगा। उसे जिन्दा रख कर ऐसी सजा दी जाए जो वह याद रखे। अजमल तो खुद ही चाहता है कि उसे मार दिया जाए। कुछ लोगों को मत इससे हटकर है। उनका कहना है कि यह सब सजाएं तो किसी को भी मिल ही जाती हैं। पहले से चली आ रही हैं यानी परम्परागत सजाएं हैं। अजमल भारत के ऊपर अब तक के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले का आरोपी है। उसने 166 भारतीयों की जान ली है। इन 166 लोगों में विजय सालस्कर,हेमंत करकरे और अशोक काम्टे जैसे भारत के सपूतों को मार डाला हो। उसे कोई परम्परागत सजा कैसे मिल सकती है। इस जघन्य अपराध के लिए तो कोई नई सजा बनानी चाहिए, जिसे देख कर कोई भी कांप जाए और आतंक फैलाने वालों और उनका साथ देने वाले अपना काम करने से पहले सौ बार सोचें। अदालत को इसके लिए कुछ खास कदम उठाने चाहिए। उसी पिटी पिटाई लकीर पर चलकर कुछ नहीं होगा। इस तरह की परम्परागत सजा कितनों को मिली। कितनों को उम्रकैद दी गई और कितनों को फांसी की सजा दी गई। उससे क्या हुआ।
इन्हीं सब बातों के बीच एक सवाल मेरे जहन में भी कौंधा। सवाल यह कि अदालत ने अगर कसाब को दोषी माना है तो बहुत हद तक संभव है कि उसे उम्रकैद तो न ही हो। हो सकता है उसे फांसी की सजा दे दी जाए। लेकिन असल सवाल सही है कि क्या उसे फांसी पर लटकाया जा सकेगा। क्या अब तक आतंक फैलाने वालों को अदालत से फांसी की सजा दी गई उन्हें लटका दिया गया। क्या अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की कहें या किसी भी कहें विडम्बना है। वे सब अभी जिंदा हैं और शान से रह रहे हैं। यही नहीं जिस देश के खिलाफ उन्होंने षड्यंत्र रचा जिस देश के लोगों को उन्होंने माना उसी देश के लोगों की मेहनत की रोटी वे खा रहे हैं। उनके लिए सुरक्षाकर्मी भी तैनात किए गए हैं। बस यही सवाल मुझे परेशान कर रहा है। मैं खुद यह समझ नहीं पा रही हूं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा मिलनी चाहिए। क्या उसे मौत दे देनी चाहिए या फिर जिंदा रखकर ऐसा सबक सिखाना चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। कुछ भी हो लेकिन मेरा खुद का मानना भी यही है कि कुछ तो खास इस बार होना चाहिए। हालांकि, इस बात पर संतोष जाहिर किया जा सकता है कि यह केस मात्र ५२१ दिन में ही पूरा हो गया और उसे दोषी करार दिया गया। शायद यही कारण है कि लोगों में न्यायपालिका के प्रति थोड़ा बहुत सम्मान अभी बचा है। अगर सजा का निर्धारण भी जल्द कर लिया जाए और उसका क्रियान्वयन भी द्रुत गति से हो तो शायद लोगों के मन में यह आए कि चलो कोई हो या न हो लेकिन न्यायपालिका अभी जिंदा है और उस पर भरोसा किया जा सकता है। परन्तु इस किस्से के कई और पहलु भी हैं उनमे से एक है देविका. दस साल की देविका को 17 महीने पहले दहशतगर्द अजमल आमिर कसाब ने बड़ा जख्म दिया था, लेकिन देविका ने भी बड़ी हिम्मत दिखाते हुए कसाब के मुकद्दमे में मील के पत्थर की भूमिका अदा की। अदालत में कसाब की पहचान का सिलसिला देविका के बयान से ही शुरू हुआ था। फिर एक बच्ची का हौसला देखकर मुंबई में इंसाफ पाने का ऐसा जज्बा जगा कि 653 लोग गवाही के लिए अदालत पहुंच गए। कई लोगों को मौत के घाट उतारने वाले कसाब की बंदूक से निकली एक गोली मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सुमेरपुर (पाली) की देविका के पैर में लगी थी।अदालत में बेशर्मी से मुस्कराने और पेशी पर लाने के दौरान पुलिसकर्मियों का मजाक उड़ाने वाला कसाब, देविका को देख पहली बार शर्मसार हुआ था, तब उसने कहा था ‘जज साहब मुझे फांसी दे दो’।मुंबई पर हमले वाले उस दिन देविका के परिवार को पुणे में रहने वाले बेटे भरतकुमार से मिलने जाना था। 14 वर्षीय बेटे जयेश और बेटी देविका के साथ, पिता नटवरलाल ट्रेन पकड़ने के लिए सीएसटी स्टेशन पर बैठे थे। अचानक भगदड़ मच गई। सामने दो युवक फायरिंग करते दिखे। लोगों को हताहत होते देख जयेश दूसरी तरफ भागा। देविका पिता के साथ वहीं खड़ी रही। कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही एक आतंकवादी ने देविका के दाहिने पैर में गोली मार दी। थोड़ी देर बाद देविका बेहोश हो गई’। अदालत की कार्रवाई के दौरान बच्ची को बार-बार वहां ले जाना आसान नहीं था। लेकिन सब चाहते थे कि आतंकवादी को उसके गुनाहों की सजा मिले। दूसरा पहलु हैं श्री वी डी जेंडे जिन्होंने कसाब और उसके दुसरे साथी अबू के हमलों के समय अपनी अनौंसर की ड्यूटी पर तैनात थे. अपने जीवन पर आये खतरे से न घबराते हुए अपनी ड्यूटी पर तैनात रहे और लोगों को पिछले निकास की ओर से निकल जाने के लिए लगातार अनाउंस करते रहे. तीसरे हैं छोटू शेख चायवाला जिसने सी एस टी टिकट काउंटर पर गोली लगने के बाद भी घायलों को ठेले पर लादकर अस्पताल पहुंचता रहा. चौथे हैं सेबेस्टियन डिसूजा मुंबई के एक छोटे दैनिक के फोटोग्राफर जो हमले के समय सीएसटी पर ही थे और उन्होंने कसाब और उसके साथी की तस्वीरे खेंची और पुलिस को बताया जिस वजह से उसे सजा मिली. फिर आते हैं चंद्रकांत टिके, कामा अस्पताल के सिक्योरिटी गार्ड जिन्होंने अपनी जान की परवाह ना करते हुए उन नौ लोगों का पता कसाब और उसके साथी को नहीं बताया और उनकी जान बचाई. अरुण जाधव मुंबई पुलिस कांस्टेबल जो शहीद कामते, सालसकर, और करकरे जैसों का जांबाज़ सहयोगी रहा और उस खौफनाक रात को उनके साथ उसी वाहन में थे. लाशों के बीच घायल होते हुए भी लाश की तरह पड़े रहे और मौका मिलते ही कंट्रोल रूम को इस घटना की जानकारी दी. इन सबके साहस और सूझबूझ ने आज किलिंग मशीन कसाब को उसका अंत दिखा दिया है. पर सबसे बड़ा श्री जाता है हमारे गृह मंत्री श्री पी चिदम्बरम को जिन्होंने नेपथ्य में रहकर भी अपने कानून के ज्ञान का पूरा उपयोग करते हुए कसाब के खिलाफ ऐसा डोजियर तैयार किया जिसकी काट ना तो पकिस्तान के पास थी और न ही उसके आकाओं के पास. सही में धन्यवाद के पात्र हैं चिदम्बरम साहेब. कसाब के खिलाफ फांसी का ऐसा फंदा तैयार किया है की आज न कल उसे इस पर लटकना ही पड़ेगा. इससे बचने के लिए चाहे वो बयां बदले या कुछ भी करे. इस कविहृदय के उदगार को ग्रहण करें.
दहशतगर्द कसाब को फांसी आई याद
अपने पूर्व बयान से मुकर गया जल्लाद
मुकर गया जल्लाद हुई ज्यों ही सुनवाई
बतलाता निर्दोष स्वयं को आज कसाई
दिव्यदृष्टि है ढीठ बहुत ये जालिम बंदा
अत: गले में जल्द डालिए इसके फंदा
वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रहा है कि मौत की सजा से क्या होगा। उसे जिन्दा रख कर ऐसी सजा दी जाए जो वह याद रखे। अजमल तो खुद ही चाहता है कि उसे मार दिया जाए। कुछ लोगों को मत इससे हटकर है। उनका कहना है कि यह सब सजाएं तो किसी को भी मिल ही जाती हैं। पहले से चली आ रही हैं यानी परम्परागत सजाएं हैं। अजमल भारत के ऊपर अब तक के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले का आरोपी है। उसने 166 भारतीयों की जान ली है। इन 166 लोगों में विजय सालस्कर,हेमंत करकरे और अशोक काम्टे जैसे भारत के सपूतों को मार डाला हो। उसे कोई परम्परागत सजा कैसे मिल सकती है। इस जघन्य अपराध के लिए तो कोई नई सजा बनानी चाहिए, जिसे देख कर कोई भी कांप जाए और आतंक फैलाने वालों और उनका साथ देने वाले अपना काम करने से पहले सौ बार सोचें। अदालत को इसके लिए कुछ खास कदम उठाने चाहिए। उसी पिटी पिटाई लकीर पर चलकर कुछ नहीं होगा। इस तरह की परम्परागत सजा कितनों को मिली। कितनों को उम्रकैद दी गई और कितनों को फांसी की सजा दी गई। उससे क्या हुआ।
इन्हीं सब बातों के बीच एक सवाल मेरे जहन में भी कौंधा। सवाल यह कि अदालत ने अगर कसाब को दोषी माना है तो बहुत हद तक संभव है कि उसे उम्रकैद तो न ही हो। हो सकता है उसे फांसी की सजा दे दी जाए। लेकिन असल सवाल सही है कि क्या उसे फांसी पर लटकाया जा सकेगा। क्या अब तक आतंक फैलाने वालों को अदालत से फांसी की सजा दी गई उन्हें लटका दिया गया। क्या अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की कहें या किसी भी कहें विडम्बना है। वे सब अभी जिंदा हैं और शान से रह रहे हैं। यही नहीं जिस देश के खिलाफ उन्होंने षड्यंत्र रचा जिस देश के लोगों को उन्होंने माना उसी देश के लोगों की मेहनत की रोटी वे खा रहे हैं। उनके लिए सुरक्षाकर्मी भी तैनात किए गए हैं। बस यही सवाल मुझे परेशान कर रहा है। मैं खुद यह समझ नहीं पा रही हूं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा मिलनी चाहिए। क्या उसे मौत दे देनी चाहिए या फिर जिंदा रखकर ऐसा सबक सिखाना चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। कुछ भी हो लेकिन मेरा खुद का मानना भी यही है कि कुछ तो खास इस बार होना चाहिए। हालांकि, इस बात पर संतोष जाहिर किया जा सकता है कि यह केस मात्र ५२१ दिन में ही पूरा हो गया और उसे दोषी करार दिया गया। शायद यही कारण है कि लोगों में न्यायपालिका के प्रति थोड़ा बहुत सम्मान अभी बचा है। अगर सजा का निर्धारण भी जल्द कर लिया जाए और उसका क्रियान्वयन भी द्रुत गति से हो तो शायद लोगों के मन में यह आए कि चलो कोई हो या न हो लेकिन न्यायपालिका अभी जिंदा है और उस पर भरोसा किया जा सकता है। परन्तु इस किस्से के कई और पहलु भी हैं उनमे से एक है देविका. दस साल की देविका को 17 महीने पहले दहशतगर्द अजमल आमिर कसाब ने बड़ा जख्म दिया था, लेकिन देविका ने भी बड़ी हिम्मत दिखाते हुए कसाब के मुकद्दमे में मील के पत्थर की भूमिका अदा की। अदालत में कसाब की पहचान का सिलसिला देविका के बयान से ही शुरू हुआ था। फिर एक बच्ची का हौसला देखकर मुंबई में इंसाफ पाने का ऐसा जज्बा जगा कि 653 लोग गवाही के लिए अदालत पहुंच गए। कई लोगों को मौत के घाट उतारने वाले कसाब की बंदूक से निकली एक गोली मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सुमेरपुर (पाली) की देविका के पैर में लगी थी।अदालत में बेशर्मी से मुस्कराने और पेशी पर लाने के दौरान पुलिसकर्मियों का मजाक उड़ाने वाला कसाब, देविका को देख पहली बार शर्मसार हुआ था, तब उसने कहा था ‘जज साहब मुझे फांसी दे दो’।मुंबई पर हमले वाले उस दिन देविका के परिवार को पुणे में रहने वाले बेटे भरतकुमार से मिलने जाना था। 14 वर्षीय बेटे जयेश और बेटी देविका के साथ, पिता नटवरलाल ट्रेन पकड़ने के लिए सीएसटी स्टेशन पर बैठे थे। अचानक भगदड़ मच गई। सामने दो युवक फायरिंग करते दिखे। लोगों को हताहत होते देख जयेश दूसरी तरफ भागा। देविका पिता के साथ वहीं खड़ी रही। कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही एक आतंकवादी ने देविका के दाहिने पैर में गोली मार दी। थोड़ी देर बाद देविका बेहोश हो गई’। अदालत की कार्रवाई के दौरान बच्ची को बार-बार वहां ले जाना आसान नहीं था। लेकिन सब चाहते थे कि आतंकवादी को उसके गुनाहों की सजा मिले। दूसरा पहलु हैं श्री वी डी जेंडे जिन्होंने कसाब और उसके दुसरे साथी अबू के हमलों के समय अपनी अनौंसर की ड्यूटी पर तैनात थे. अपने जीवन पर आये खतरे से न घबराते हुए अपनी ड्यूटी पर तैनात रहे और लोगों को पिछले निकास की ओर से निकल जाने के लिए लगातार अनाउंस करते रहे. तीसरे हैं छोटू शेख चायवाला जिसने सी एस टी टिकट काउंटर पर गोली लगने के बाद भी घायलों को ठेले पर लादकर अस्पताल पहुंचता रहा. चौथे हैं सेबेस्टियन डिसूजा मुंबई के एक छोटे दैनिक के फोटोग्राफर जो हमले के समय सीएसटी पर ही थे और उन्होंने कसाब और उसके साथी की तस्वीरे खेंची और पुलिस को बताया जिस वजह से उसे सजा मिली. फिर आते हैं चंद्रकांत टिके, कामा अस्पताल के सिक्योरिटी गार्ड जिन्होंने अपनी जान की परवाह ना करते हुए उन नौ लोगों का पता कसाब और उसके साथी को नहीं बताया और उनकी जान बचाई. अरुण जाधव मुंबई पुलिस कांस्टेबल जो शहीद कामते, सालसकर, और करकरे जैसों का जांबाज़ सहयोगी रहा और उस खौफनाक रात को उनके साथ उसी वाहन में थे. लाशों के बीच घायल होते हुए भी लाश की तरह पड़े रहे और मौका मिलते ही कंट्रोल रूम को इस घटना की जानकारी दी. इन सबके साहस और सूझबूझ ने आज किलिंग मशीन कसाब को उसका अंत दिखा दिया है. पर सबसे बड़ा श्री जाता है हमारे गृह मंत्री श्री पी चिदम्बरम को जिन्होंने नेपथ्य में रहकर भी अपने कानून के ज्ञान का पूरा उपयोग करते हुए कसाब के खिलाफ ऐसा डोजियर तैयार किया जिसकी काट ना तो पकिस्तान के पास थी और न ही उसके आकाओं के पास. सही में धन्यवाद के पात्र हैं चिदम्बरम साहेब. कसाब के खिलाफ फांसी का ऐसा फंदा तैयार किया है की आज न कल उसे इस पर लटकना ही पड़ेगा. इससे बचने के लिए चाहे वो बयां बदले या कुछ भी करे. इस कविहृदय के उदगार को ग्रहण करें.
दहशतगर्द कसाब को फांसी आई याद
अपने पूर्व बयान से मुकर गया जल्लाद
मुकर गया जल्लाद हुई ज्यों ही सुनवाई
बतलाता निर्दोष स्वयं को आज कसाई
दिव्यदृष्टि है ढीठ बहुत ये जालिम बंदा
अत: गले में जल्द डालिए इसके फंदा
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