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Showing posts from June, 2020

कतरा कतरा खामोशी

          मुंबई में सुशांत सिंह राजपूत ने अपने फ़्लैट में फाँसी लगा कर आत्महत्या (जैसा लोग कह रहें है ) कर ली, कर ली तो कर ली,  दोस्त लोग कह रहे हैं वो कई महीनों से "डिप्रेशन" से पीड़ित थे,  दोस्त लोग कह रहे हैं तो सही होगा, सिर्फ चौंतीस साल की उम्र में अच्छी शिक्षा ,अच्छा खान-पान ,मौज-मस्ती ,मुंबई की चमक -धमक वाली जीवन, गर्लफ्रैंडस , पैसा, स्टारडम, जो चाहे वो पाए , उसके बाद एक संघर्ष शुरू हुआ (हो सकता है) और फिर तुरंत "आत्महत्या", क्योंकि यही सबसे आसान है, जी लिए जितना जीना था और चले गए,  एक झटके में सबकुछ छोड़ कर, कई सपनों को तोड़कर,  कई उम्मीदों को ठोकर मारकर ,  जी हाँ , सब कुछ ख़त्म कर दिया सुशांत ने कुछ भी नहीं छोड़ा ।         लेकिन ऐसा नहीं है ,अभी कुछ बचा है | आइये पटना चलते हैं जहाँ उनके पिता जी रहते हैं --- "जिन्होंने जीवन भर संघर्ष किया, जीने के लिए , परिवार के लिए,  बच्चों के लिए,  बच्चों के सपनों के लिए,  अपने स्वाभिमान के लिए,  अपने गर्व के लिए, लेकिन कभी आत्महत्या करने को नहीं सोची - उन्हों...

वर्चुअल राजनीति की धुन

किसी भी राजनेता का आकलन उसके भाषण देने की कला के आधार पर नहीं बल्कि सवालों के जवाब देने के की क्षमता के आधार पर होना चाहिए। भाषण देना एक तरह का लाइव परफॉरमेंस है।  अगर आप में अभिनय की नैसर्गिक प्रतिभा है या आप उसे अभ्यास से निखारने के लिए प्रतिबद्ध हैं तो आप अच्छे वक्ता हो सकते हैं। लेकिन जवाब आप तभी दे सकते हैं, जब आपमें किसी विषय की समझ हो, साथ-साथ न्यूनतम जिम्मेदारी और ईमानदारी भी हो। मेरे लिए राहुल गाँधी को पप्पू' ना मानने का कारण पिछले तीन साल में दिये गये वो जवाब हैं, जो जिन्होंने ट्रोल और कॉरपोरेट मीडिया के हमलावर पत्रकारों के सवालों पर दिये हैं।  2017 के गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गाँधी ने एक सवाल के जवाब में कहा था `भारत जैसे जटिल देश को चलाना एक तरह का कंप्रोमाइज़ है। जो व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा समूहों से बातचीत करेगा और उन्हें ठीक से सुने और समझेगा, वही इस काम में कामयाब हो सकता है।' मेरा ख्याल है, इससे न्यायसंगत कोई बात नहीं हो सकती है। मैंने एक पोस्ट में लिखा था कि नरेंद्र मोदी एक ऐसे दौर के नेता हैं, जहाँ उपभोक्तावाद अपने चरम पर है। वोटर राजनेता को एक सिर्फ प्रो...

कोरोना काल और दम तोड़ता बचपन

बड़ी-बड़ी बातें केवल कुठाराघातें बाल श्रम अनवरत निरंतर आघातें समाज का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं हैं जहाँ बच्चों से काम नहीं लिया जाता हो और न ही कोई ऐसा कोई धंधा है, जहाँ मालिक बच्चों का शोषण न करता हो । आज आसमान छूती महंगाई में भी इन्हें इतनी कम मजदूरी मिलती हैं की इनके लिए ठीक तरह से जीवन-यापन भी कठिन होता है। बाल श्रमिकों से जोखिमपूर्ण एवं आपराधिक कार्य कराया जाना भी उनके शोषण का एक ओर बदतर पक्ष हैं। 12 जून को वर्ल्ड डे अगेंस्ट चाइल्ड लेबर होता है यानि अंतरराष्ट्रीय बाल मजदूरी निषेध दिवस. ये दिन बाल मज़दूरी की समस्या, और इससे बच्चों को कैसे निकाला जा सकता है, उस पर फोकस करता है. याद कीजिये 12 साल की जमालो मड़कामी को जो पैदल तेलंगाना से चलते हुए बीजापुर जाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन भूख और प्यास से चलते चलते दम तोड़ दिया. देश में बाल मजदूरी की समस्या ऐसे ही बड़ी थी, लेकिन लॉकडाउन ने मुसीबत और बढ़ा दी है. गरीब परिवार, और गरीब हो गए हैं, मजदूरों के बच्चों के स्कूल  छूटे हैं, उनकी किताबें रूठी हैं, उनके सपने टूटे हैं. कलम पकड़ने की उसकी उम्र थी साहब जिम्मेदारियों ने मजदूर बना दिया उसे।...

मीठे पानी का दलदल

आज की ताजा खबर, कल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीमार होने का समाचार पूरी दिल्ली में छाया रहा और आज सुबह उनका कोरोना का टेस्ट हुआ। शाम होते ही रिपोर्ट आई और जैसा कि उम्मीद थी रिपोर्ट 'नेगेटिव'। खैर ये वक्त बीमारी पर सियासत का नहीं है। चर्चा सिर्फ इसलिए कि जिस प्रदेश में डाक्टर रिपोर्ट आने से पहले मौत के घाट सिधार जाता है उस प्रदेश के मुख्यमंत्री की रिपोर्ट एक ही दिन में आ जाती है। क्योंकि आम आदमी के नाम पर ये खास बन चुके हैं।       खैर, आज आपसे चर्चा करना चाहती हूं उन बातों पर जिन्हें दिल्ली सरकार हम दिल्ली वालों से लगातार छुपा रही है। कोरोनावायरस के आंकड़े लगातार सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे हैं और दिल्ली के मुख्यमंत्री हमारा ध्यान इधर उधर भटकाने में लगे हैं। आज की तारीख तक दिल्ली में फोन 29943 मामले सामने आ चुके हैंऔर दिल्ली सरकार और एलजी फिर से इस नूरा कुश्ती में व्यस्त हो गए हैं दिल्ली में कम्युनिटी स्प्रेड हो रहा है कि नहीं हो रहा है। अभी थोड़ी देर पहले दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया प्रेस को बता रहे थे की दिल्ली सरकार का आकलन है कि 12 से 13 द...

टूटे सारे भरम बारी बारी

हिंदू धर्मशास्त्रों में बार बार कहा गया है कि जब जब पाप और अधर्म की बढोत्तरी होगी तब तब प्रकृति या यूं कहें कि स्वयं निराकार ईश्वर स्वयं संतुलन कायम करेंगे। पिछले कुछ सालों से सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में बढती विषमताएं या यूं कहें कि अवसरवादी राजनीति का बढता आकार यहां तक आ पहुंचा था कि आम व्यक्ति अपने साये पर भी शक करने लगा था। ऐसी हालत की पराकाष्ठा लगातार बढती सी लग रही थी कि 2020 आया और आते ही कोविड-19 का साया अपने साथ ले आया। इस बीमारी के बढते भय ने इन अवसरवादी स्वनामधन्य बगुलाभगत सत्ताधारी नेताओं के सब्जबाग भरे हवामहलों को पल में धाराशायी कर दिया और इनका असली चेहरा देश के सामने उजागर कर दिया। तथाकथित ‘क्रांति’ (अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन) की इस संतान; अरविंद केजरीवाल की प्रशासनिक कुशलता उसकी कुछ हालिया हरकतों से जगजाहिर हो गई हैं। केजरीवाल ने पहले भी कोरोनावायरस के प्रसार संबंधी तथ्यों और आंकड़ों को लेकर गोलमोल बातें की हुई हैं। कोरोनावायरस के कारण जब आंकड़ों की उनकी राजनीति उनके लिए परेशानी का कारण बन गई है और वह संख्याओं को कम दिखाने की जद्दोजहद में लगे नज़र आने ल...