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टूटे सारे भरम बारी बारी

हिंदू धर्मशास्त्रों में बार बार कहा गया है कि जब जब पाप और अधर्म की बढोत्तरी होगी तब तब प्रकृति या यूं कहें कि स्वयं निराकार ईश्वर स्वयं संतुलन कायम करेंगे। पिछले कुछ सालों से सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में बढती विषमताएं या यूं कहें कि अवसरवादी राजनीति का बढता आकार यहां तक आ पहुंचा था कि आम व्यक्ति अपने साये पर भी शक करने लगा था। ऐसी हालत की पराकाष्ठा लगातार बढती सी लग रही थी कि 2020 आया और आते ही कोविड-19 का साया अपने साथ ले आया। इस बीमारी के बढते भय ने इन अवसरवादी स्वनामधन्य बगुलाभगत सत्ताधारी नेताओं के सब्जबाग भरे हवामहलों को पल में धाराशायी कर दिया और इनका असली चेहरा देश के सामने उजागर कर दिया। तथाकथित ‘क्रांति’ (अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन) की इस संतान; अरविंद केजरीवाल की प्रशासनिक कुशलता उसकी कुछ हालिया हरकतों से जगजाहिर हो गई हैं। केजरीवाल ने पहले भी कोरोनावायरस के प्रसार संबंधी तथ्यों और आंकड़ों को लेकर गोलमोल बातें की हुई हैं। कोरोनावायरस के कारण जब आंकड़ों की उनकी राजनीति उनके लिए परेशानी का कारण बन गई है और वह संख्याओं को कम दिखाने की जद्दोजहद में लगे नज़र आने लगे तो वे अपना असली रूप दिखाने के लिए विवश हो गये हैं. अभी के उनके कदमों से ऐसा लगता है कि यह आइआइटियन संख्याओं के अपने ही खेल में उलझ गया है. जिस तरीके से अरविंद केजरीवाल दिल्ली में सरकार चला रहे हैं, ऐसा लगता है अगले चुनाव तक क्रेडिट लेने के लिए उनके पास कोई काम बचेगा भी नहीं क्योंकि अरविंद केजरीवाल बाकी कोई काम भले ही भूल जायें दिल्ली वालों से सुझाव लेना नहीं भूलते लेकिन करते वहीं हैं जो उनके राजनीतिक आकाओं यानि भाजपा सिरमौर के मुखारविंद से निकलता है। लॉकडाउन के महीने भर बाद अरविंद केजरीवाल को अचानक दिल्ली छोड़ कर जा रहे मजदूरों का ख्याल आ गया और मजदूरों की हालत देख कर ऐसा लगने लगा कि सिस्टम फेल हो गया हो पर सिस्टम किसका था और अचानक मजदूरों का दर्द महसूस क्यों होने लगा। फिर सालिसिटर तुषार मेहता और अमन लेखी को दिल्ली दंगों के मामले में पैरवी के लिए नियुक्त करके उन्होंने यह जाहिर भी कर दिया कि उन्हें इस बात से तनिक भी गुरेज नहीं है कि उनको दिल्ली भाजपा की ‘बी’ टीम समझा जाए। खैर अभी हम चर्चा करेंगे एक ऐसी बात पर जिसने हमारे देश की अखंडता और संविधान के अनु0 19(1) के अंतर्गत देश के नागरिकों के भारतीय भूभाग में निर्बाध आने-जाने के मौलिक अधिकार को ही बाधित कर दिया है। कल तक अखंउ भारत के नक्शे के सामने खडे हो भारत माता है राष्ठ्रवाद के नाम पर वोट मांग सत्ता में आने वाले केजरीवाल ने दिल्ली वालों से दिल्ली की सीमा सील कर दिल्ली के अस्पतालों में केवल दिल्ली वालों का ईलाज करने के लिए राय मांगी है। लगता है कि केजरीवाल से कोरोना संकट यूं नहीं संभल रहा है कि वे दिमागी तौर पर विक्षिप्त हो गये हैं और अदालत की उस फटकार को भूल गये हैं जो उनको दिल्लीवालों के साथ भेदभाव के लिए पडी थी। वैसे दिल्ली में बीते 24 घंटे के दौरान कोरोना संक्रमण के सर्वाधिक 1298 नए रोगी मिले हैं। दिल्ली सरकार के मुताबिक, कोरोना वायरस से 33 और लोगों की मौत हुई है। इसके साथ ही अब दिल्ली में कोरोना से मरने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या 556 पहुंच गई है। तो, दिल्ली में आम आदमी पार्टीसरकार की ताजा रायशुमारी,जिसमें उसे पूछा है कि क्या कोरोना काल में दिल्ली के अस्पतालों के बेड सिर्फ दिल्ली वालों के लिए आरक्षित होने चाहिए,सवालों के घेरे में है। उपर से कोढ में खाज यह कि दिल्ली की अंतर्राज्यीय सीमाएं सील कर दी गई हैं। अब यहां पर दो सवाल आते हैं- पहला सवाल यह है कि जिस मकसद से एनसीआर की कल्पना की गई थी, क्या वह आज पूरा हो रहा है। एनसीआर की सोच स्व0 शीला दीक्षित की कल्पना थी और दशकों पुरानी है। राजधानी दिल्ली के बोझ को थामने और यहां की औद्योगिक गतिविधियों को सीमित करने के लिए इसे मूर्त रूप दिया गया था। 1985 में एनसीआर प्लानिंग बोर्ड का गठन किया गया था और शुरूआत में चुंकि किसी औद्योगिक यूनिट को दिल्ली में नहीं लगने दिया तो दिल्ली से लगे हुए नोएडा, गुडगांव जैसे इलाके इंडस्ट्रियल हब बनकर उभरे और नतीजे में इन सटे इलाकों में कंक्रीट के जंगल बनने शुरू हो गये हैं। यहां के निवासी लोग खुद को हाल हाल तक दिल्लीवाला ही माना करते थे। पर आंदोलन की शुरूआत और उससे उत्पन्न विभाजित मानसिकता ने इस योजना को ही सिरे से खारिज कर दियाऔर एनसीआर यानि ग्रेटर दिल्ली का अस्तित्व बनने से पहले ही मटियामेट कर दिया। दूसरा सवाल, दिल्ली के मुख्यमंत्री उपमुख्यमंत्री से लेकर सभी विधानसभा सदस्यों को चुनने वाली जनता कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की है और ये सारे माननीय भी दिल्ली में पैदा नहीं हुए थे, सबलोग दूसरे दूसरे राज्यों से आकर यहां बसे हैं। मुख्यमंत्री बनने से पूर्व केजरीवाल स्वयं गाजियाबाद निवास करते थे आप सबों को याद होना चाहिए।दिल्ली के ज्यादातर अस्पताल एवं संसाधन केंद्र सरकार के खर्च पर चलते हैं। जो टैक्स दिल्ली सरकार को मिलता है वह भी देशभर से रोजी के लिए दिल्ली आनेवाले लोगों का पैसा है। जिस मुख्यमंत्री के पास अपने कर्मचारियोंको वेतन देने के लिए पैसा ना हो वह कैसे दूसरे राज्य के बीमारों के लिए दिल्ली के अस्पतालों को बंद करने की बात कर सकता है। रामलीला मैदान में संविधान और जनता के अधिकारों की तीसरी कसम खाने वाले अरविंद केजरीवाल अब भूल चुके हैं कि उनको जनादेश देने वाली जनता की जडे कहां कहां पर हैं। अन्ना की टोपी में सिर डालकर आम से खास बने केजरीवाल ने आवाम की जमीन पर अपनी खास फसल काटी। आम आदमी पार्टी नाम रखकर केजरीवाल ने पहले पार्टी को अपनी बपौती बनाया और अब दिल्ली को भी बाप की जागीर समझ बैठे हैं। पहले अपने पंख देशभर में पसारने की ऐसी सनक चढी कि जहां देखो चुनाव लडने पहुंच जा रहे हैं पर जब ना संभली तो दिल्ली कुंडली मारकर ऐसे बैठे हैं कि मानो दिल्ली इनके बिना अनाथ हो जाएगी। इस आदमी की मौजूदा राजनीति को देखकर लगता है जैसे कि इनका काम सिर्फ जनता को बरगलाना है ताकि वह विकल्प ना ढूंढ सके। अंग्रेजी की एक कहावत है ‘ए वूल्फ इन शीप क्लोदिंग्स इज मोर डेंजरस देन ए बेयर वूल्फ। भाजपा ने ना सिर्फ देश की जनता को बरगलाया बल्कि एक ऐसा चेहरा तैयार कर दिया है जिसका काम ही है कि जो केंद्र सरकार तय करे उसपर पहले नूराकुश्ती करनी है और फिर प्रण्म्य देवता कहकर दंडवत हो लेना है। केजरीवाल का साथ देनेवाले नामचीन आज की तिथि में रो रहे हैं कि इस व्यक्ति ने ना सिर्फ उनका इस्तेमाल किया बल्कि उदारवादी लोकतंत्र को अवसरवादी खासतंत्र में बदल दिया है। जनता को सशक्त करने का भ्रम फैलाने वाला व्यक्ति पहले तो दिल्ली के प्रवासी नागरिकों का वोट पाकर मुख्यमंत्री बन जाता है फिर इन्हीं प्रवासी कामगारों को दिल्ली से पलायन पर मजबूर कर देता है। अब कहता है कि दिल्ली में बाहर के लोगों का इलाज संभव नहीं है। सोच लीजिए कहीं यह व्यक्ति बनारस से चुनाव जीत गया होता तो दिल्ली का क्या होता। नेता का काम होता है जनता का सही मार्गदर्शन करना, उनकी सोच को विस्तृत बनाना।विश्वबंधुत्व को संवैधानिक मान्यता देनेवाले इस राष्ट्र में आज आंतरिक विखंडन की ऐसी भावना भर गई है मानो सरदार पटेल का साढे पांच सौ से अधिक रियासतों का विलय कराकर एक अखंड भारत देश बनाने का कार्य मानो विफल हो गया है। यूपी का मुख्यमंत्री कहता है कि हमारे लोगों को रोजगार देने से पहले हमसे आज्ञा लेनी होगी। दिल्ली वाला कहता है कि हम अपने अलावा दूसरे लोगों का इलाज नहीं होने देंगे। हरियाणा वाला कहता है कि हम दिल्ली को पानी नहीं देंगे। मध्य प्रदेश वाला कहता है हम सिर्फ अपने मजदूरों को सीमा से भीतर लेंगे। आसाम वाला बाहरी मजदूरों को भगा देने की बात करता है। आखिर किस मुल्क में रह रहे हैं हम। साथियों ध्यान रखिये, ये जो आग है ना ये जंगल की आग है जिसकी जद में हर कोई आएगा। बचेगा कोई भी नहीं। राष्ट्रीयता की भावना संकीर्णतावाद के इस निम्नतम स्तर पर पहुंच चुकी है कि हम प्रतिक्रियावादी बनने को मजबूर हो जाऐंगे। केंद्र सरकार ने हमको पाकिस्तान के नाम पर बरगलाकर देश का बेडा गर्क कर दिया है। आर्थिकी समाप्त हो गई है। रोटी रोजगार के लाले पड गए हैं।और केजरीवाल उसी राह पर चलकर दिल्ली की जनता के बीच वैमनस्य पैदा कर रहे हैं। दिल्ली के लोगों का हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है। जब अमेरिका जैसे मुल्क में भेदभाव के आरोपी लोग घुटने पर आकर जनता से माफी मांग रहे हैं, अरविंद केजरीवाल जैसे लोग दिल्ली की मिलनसार जनता को दुराग्रही नीती की ओर धकेलकर कोरोना से भी खतरनाक वायरस फैला रहे हैं। दिल्ली के आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने कहा था- ए वाए इंकलाब जमाने के जौर से दिल्ली जफर के हाथ से पल में निकल गई तो दिल्ली किसके हाथों से निकले और किसके हाथों में जाए इसका निर्णय खुद दिल्ली को ही करना है।

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