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Showing posts from May, 2010

निरुपमा हमें माफ़ करना

आज कई दिनों के बाद मन काफी उदास सा लगता है. पिछली २९ अप्रैल से जब से निरुपमा पाठक की मृत्यु या यूँ कहें की हत्या का समाचार सुना तब से जाने मन में एक अजीब सी घिन घर कर गई है. लगता है शायद रिश्तों की कीमत नहीं रह गयी है. भावनाए शुन्य में विलीन हो गयी है. ग़ालिब की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं. "हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है" शायद यही सोच रही होगी निरुपमा की आत्मा, अगर कहीं होगी तो, खुद को उसकी जगह रखकर देखती हूँ तो महसूस होता है. कैसी नारी छली जाती है अपनों के ही हाथों. निरुपमा केवल एक लड़की नहीं थी वो तो एक सोच थी. एक आम हिन्दुस्तानी लड़की की तरह जो अपने परिवार को बेहद प्यार करती थी. और प्यार करती थी उसको जिसके संग उसने जीवन बिताने के सपने देखे थे. एक आम लड़की की तरह अपने पिता के बेहद करीब और बहुत दुलारी. माँ की आँखों का तारा. भाइयों की लाडली. पर क्या सबने अपना कर्त्तव्य निभाया. वो तो अपने रिश्तों के प्रति इतनी वफादार निकली की अपने प्रेम को सामजिक मर्यादा दिलाने के लिए मात्र अपने गृहनगर चली गयी ताकि अपने जनकों की स्वनामधन्य मर्यादा को आंच ना आने दे. और उन्होंन...

कौन है जिम्मेदार?

कल दोपहर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब २० मिनट तक मौत दौड़ती रही. शिकार भागते रहे बचने की कोशिश करते रहे. खुशकिस्मत थे जो बच गए पर जिनकी किस्मत साथ ना दे पाई उनमे से एक थी ३५ वर्षीया सोनी जो हाउस मेड का काम करती थी और साल में एक बार अपने परिवार से मिलने जा रही थी. पर इस भगदड़ ने उसे अंधी मौत के जबड़ों में धकेल दिया. सोनी जैसे कई और भी अभागे रहे. पर बेशर्मी तो देखिये, मौत की इस भगदड़ के बाद रेलवे भगदड़ का ठीकरा कभी यात्रियों तो कभी इत्तिफाक पर फोड़ रही है। हादसे के बाद नींद से जागी रेलवे ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा-व्यवस्था दुरुस्त करने के दावे भी कर डाले। पर हादसे का शिकार हुए लोग रेलवे की बद इंतजामी को ही भगदड़ की वजह मानते हैं। मालूम हो कि इस हादसे में 40 से ज्यादा यात्री घायल हुए हैं। घायलों का लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायलों में 7 लोगों की हालत अभी भी गंभीर बताई जा रही है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची मौत की भगदड़ का शिकार हुए लोग घटना के घंटों बाद भी सदमे से उभर नहीं पाए हैं। लेकिन रेलवे प्रशासन की बेशर्मी इतनी ज्यादा हो गई है की आँखों देखि मक्खी भी ...

आज की गीता

मैं गीता हूँ आज के युग की क्यों कृष्ण के इन्तजार मैं बैठूं मात्र भगवत मुख वाचन के लिए अपने भाग्य पर इतराऊँ ऐठूँ बीत गया वह समय जब अर्जुन भीष्म का विपक्षी होता था छाती पर वाण चलाने से पहले शत्रु के पैर वह छूता था मर्यादाये अब शेष हुई न रहा सिद्धांत कोई बांकी गांधी, नेहरु और शास्त्री के वचनों की मात्र शेष रही झांकी पांडव न बचा राजनीति मैं कोई बस कौरव ही घुस आये हैं शकुनी साथ था उनके ये तो शकुनी के ही जाए हैं. ध्रितराष्ट्र बनी सारी जनता बस हाहाकार मचाती है द्रौपदी का चीरहरण जब होता मूक-बधिर हो जाती है कुरुक्षेत्र की इस भूमि पर अब शंखनाद मैं स्वयं करूंगी चिरनिद्रा मैं सोये युवाओं के प्राणों में स्वयं मैं ओज भरूँगी न सोचो के बस वचनमात्र से गीता के उपदेश सुनाऊँगी जो वक्त पड़ा तो थाम गांडीव स्वयं युद्धभूमि मैं भी उतर आऊँगी मैं महाभारत के इस देश मैं युगक्रांति लेकर आऊँगी

बचपन

काश के मैं बच्ची ही होती न देखती जाति धर्मं मैं न सामाजिक प्रतिष्ठा की बलि चढ़ती जब दिल करता तब मैं हंसती जब दिल दुखता मैं रो जाती काश के मैं बच्ची ही होती. न झेलती मैं छल- कपट मात्र किसी के जीवन-यापन के लिए न पाती दुर्व्यवहार किसी से सिर्फ उसके पेट-पोषण के लिए भूख लगे पर पी मात्रीक्षिर उनके गोदी में सो जाती उनके स्नेह की छाया पाती काश के में बच्ची ही होती न करती मैं आपाधापी इस अर्थयुग की अंधी दौर में मात्र सफल होने के लिए न जाती उलटे छोर मैं रिश्तों की स्नेहवर्षा में भीगकर आनद का चरम पाती मैं न दुखित होती मन ही मन देख लुप्त होती मानवता का भाव काश के सबका शैश्त्व न जाता सुख शान्ति होती सबके द्वार पर निश्चल निष्पापी बन रहते सब खुश रहती यह सृष्टि भी काश के मैं बच्ची ही होती.

आईना

खामोश व वीरान-सी आँखें हिचकियों में टूटती सांसें आसपास कुछ ढूँढती हैं जाने क्या कुछ बूझती हैं टटोलती हैं धरा पर नंगे पैरों सरक सरक कर छिलते घुटनों पर मंडराती मक्खियों को हटाते भगाते जमीन पर पड़े कंकरों पत्थरों से खुद को बचाते बचाते. पर हाथ में आता है सिर्फ गोश्त का टुकड़ा कोई इसे हिन्दू बताता कोई मुस्लमान का कहता कोई सांप्रदायिकता की संज्ञा देता कोई धर्मनिरपेक्षता का राग अलापता पर कोई तो बताओ उस दुधमुंहे मासूम का है क्या दोष भूख से तड़पती आत्मा को तृप्त करने के लिए माँ की छाती समझ वह लोथड़े को भी मुँह लगाता और मुख में दूध की जगह खून भरा आता सैकड़ों लाशों के बीच मरे- अधमरों के संग रक्त सना मुख लिए एक मासूम सा चेहरा क्या वह इस देश का भविष्य है !!

जबान संभाल के

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भाषण करते-करते बहक गए और गाली-गलौच कर गए। गाली-गलौच भी किया तो किनसे खाली बैठे लालू और मुलायम सिंह यादव से। जिनके पास उनकी खुद की राजनीति के लिए मुद्दों का अकाल पड़ा हुआ है. अब गडकरी जी ने उन्हें अपनी एडियाँ ऊँची करने के लिए राजनीति की जमीन दे दी है पर शायद इन यादव द्वय को इतनी सी बात याद नहीं रही है की एडियाँ ऊँची करने से कद ऊँचा नहीं हो जाता है. दरअसल चंडीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने लालू और मुलायमसिंह को जिन अलंकारिक शब्दों का प्रयोग किया, अगर वे तथा उनके गुर्गे भी ऐसे ही मधु भरे रसास्वादन शब्द आपको भी कह दे तो बताओ कैसे लगेगा? (वैसे मुलायम जी की और से मोहनसिंह जी ने अपना वाकतीर छोड़ दिया है) चले हैं राजनीति के बाजपेयी तथा राहुल बनने के लिए और इनके भाषण इतने निम्न स्तर के ! जोश में होश खो देना एक अच्छे लीडर शिप की पहिचान नहीं हो सकती है ! ऊंची कुर्सी वह भी देश की कभी नंबर वन कभी नंबर टू पार्टी ! मजे की बात तो यह है की यह वह पार्टी है जिसने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं, आचार-व्यवहार, भाषा का जिम्मा अपने कन्धों पर ले रखा है, उसका पार्टी अ...

कसाब का हिसाब

अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर वो जो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं। बाकी बीच के लोगों को कोई नहीं जानता। आज वह बात सही सी लग रही है। कसाब को बच्चा बच्चा इसलिए जानता है कि उसे जघन्यता की सारी हदें पार कर दीं। बहुत संभव है कि इसमें मीडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अखबारों और टीवी में उसकी खबरें खूब प्रमुखता से छापी और दिखाई गईं। और जब लगातार तीन दिन तक मुंम्बई पर आतंकी साया रहा तब तो लाइव दिखाया गया। लगातार लाइव। अब २४ घंटे में कोई समय तो ऐसा आएगा ही जब बच्चा टीवी देखेगा कि कभी नहीं देखेगा। खैर यह मुद्दा नहीं है। मूल बात कुछ और ही है। वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रह...