कल दोपहर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब २० मिनट तक मौत दौड़ती रही. शिकार भागते रहे बचने की कोशिश करते रहे. खुशकिस्मत थे जो बच गए पर जिनकी किस्मत साथ ना दे पाई उनमे से एक थी ३५ वर्षीया सोनी जो हाउस मेड का काम करती थी और साल में एक बार अपने परिवार से मिलने जा रही थी. पर इस भगदड़ ने उसे अंधी मौत के जबड़ों में धकेल दिया. सोनी जैसे कई और भी अभागे रहे. पर बेशर्मी तो देखिये, मौत की इस भगदड़ के बाद रेलवे भगदड़ का ठीकरा कभी यात्रियों तो कभी इत्तिफाक पर फोड़ रही है। हादसे के बाद नींद से जागी रेलवे ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा-व्यवस्था दुरुस्त करने के दावे भी कर डाले। पर हादसे का शिकार हुए लोग रेलवे की बद इंतजामी को ही भगदड़ की वजह मानते हैं। मालूम हो कि इस हादसे में 40 से ज्यादा यात्री घायल हुए हैं। घायलों का लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायलों में 7 लोगों की हालत अभी भी गंभीर बताई जा रही है।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची मौत की भगदड़ का शिकार हुए लोग घटना के घंटों बाद भी सदमे से उभर नहीं पाए हैं। लेकिन रेलवे प्रशासन की बेशर्मी इतनी ज्यादा हो गई है की आँखों देखि मक्खी भी निगलने से उन्हें कोई गुरेज नहीं है. प्रशासन भगदड़ की बात से साफ इंकार कर रहा है। दूसरी तरफ हादसे में अपनों को खो चुके लोग कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। शोभा के जहन में रह रह कर वो खौफनाक मंजर घूम रहा है जिसने उसकी भाभी को छीन लिया। शोभा अपनी भाभी के साथ खुशी-खुशी अपने घर भागलपुर जा रही थी तभी अचानक प्लैटफार्म नंबर 12 पर लोगों का एक ऐसा सैलाब आया जिसके तले उसकी भाभी की सांसे थम गईं। वहीं हादसे के बाद रेल प्रशासन डैमेज कंट्रोल में लग गया। आनन-फानन में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और हादसे के बाद एतिहात के तौर पर उठाए जानेवाले कदमों का बखान किया। सोमवार से प्लैटफोर्म टिकट की बिक्री नहीं होगी। इस सबके बीच रेलवे का मानना है की भगदड़ तो यात्रियों के सीढी से गिरने के चलते हुई। प्लेटफोर्म बदलने का भगदड़ से कोई लेना देना नहीं।
फिर सवाल ये उठता है की क्या भगदड़ का शिकार हुए लोग झूठ बोल रहे हैं? हर रोज नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से करीबन 300 ट्रेने चलतीं हैं। जिनमें 7 लाख यात्री सफर करते हैं। सबसे बड़ा सवाल ये की आखिर ठीकरा यात्रियों के मत्थे फोड़ने के बजाए रेलवे इस घटना से सबक क्यों नहीं लेता? ज्ञातव्य हो की नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से छुटने वाली गाड़ियों की संख्या में से करीब १५० गाड़ियां पूरब की ओर जाती हैं जिन्हें नवनिर्मित आनंदविहार रेलवे स्टेशन पर शिफ्ट करने के लिए योजना बनायीं गई थी परन्तु रेलवे की लालफीताशाही की वजह से ना तो अब तक यह स्टेशन पूरी तरह कार्य कर पा रहा है और मात्र ७ ट्रेने परिचालित हो रही हैं जिनमे से मात्र २ रोजाना चलती हैं और शेष साप्ताहिक. अब खुद ही निर्णय करें की जिम्मेदारी किसकी है. निष्कर्ष तो यही निकाला जा रहा है की लोगों के सिर पर ठीकरा फोड़ने का निर्देश किसी और का नहीं बल्कि रेल मंत्री ममता बनर्जी की तरफ से दिया गया है। ममता ने लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाए हादसे का ठीकरा उन पर ही फोड़ दिया। जी हां, नगर निगम चुनावों में व्यस्त दिल्ली से दूर कोलकाता में बैठीं रेल मंत्री के मुताबिक यात्रियों को खुद पर काबू रखना चाहिए यानि भगदड़ रेलवे की नहीं लोगों की लापरवाही की वजह से मची।
रेल मंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान .......!ऐसे हादसे होते रहते हैं..और इनको रोका नहीं सकता है....इसके लिए लोग ही जिम्मेदार हैं ! क्या बात है ...अगर यह हादसा किसी और रेल मंत्री के समय हो गया होता तो अब तक ममता बहन लाल-पीली हो कर चीखनेचिल्लाने लग जाती और जितनी भड़ास,गुस्सा निकालती वो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ...लेकिन खुद रेल मंत्री होने पर और ऐसे बयान दे कर वो अपना पल्ला झाड रही हैं.
मालूम हो कि जब रेलवे की मुखिया ही भगदड़ का ठीकरा आम आदमी के सिर फोड़ने पर आमादा हों तो बाकी अफसर तो उसी सुर में बात करेंगे। डीआरएम नई दिल्ली ने सबसे पहले चश्मदीदों के बयानों को झुठला दिया। उन यात्रियों की बात को गलत ठहरा दिया जो ट्रेन के प्लेटफॉर्म बदलने की सूचना के बाद मची भगदड़ का शिकार हुए। डीआरएम के मुताबिक ट्रेन के प्लेटफॉर्म में कोई बदलाव नहीं किया गया था।वहीं उत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने तो प्लेटफॉर्म पर किसी भगदड़ की घटना से ही साफ इंकार कर दिया। प्लेटफॉर्म पर बिखरे जूते चप्पल भले भगदड़ की घटना की साफ गवाही दे रही हो लेकिन रेलवे अपने गैरजिम्मेदाराना रवैए को ढंकने में जुट गया है। हद तो और हो गयी की जब कोलकाता में बैठ छुट्टियाँ मना रही ममता जी की ममता जाने कौन से बिल में घुस गयी की उन्होंने मात्र टी० वी० पत्रकारों को एक बाईट देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली. पहले मौत का नजराना दिया अब मृतकों को २ लाख और घायलों को पचास हजार. क्या यही कीमत है इंसानी जान की. हद है संवेदनहीनता की.
भगदड़ की घटना पर पर्दा डालने और यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश पर राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि ममता बनर्जी को यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने वाला बयान नहीं देना चाहिए था। वहीँ इस भगदड़ को देखते हुए और रेलवे की प्रतिक्रिया को देखते हुए स्विम यात्रियों ने उसी समय से प्लेटफोर्म न० १६ से जा रही ट्रेन में खुद ही कतार लगा कर प्रवेश किया.
इस हादसे के बाद एक बार फिर रेलवे के कामकाज को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं--
- प्लेटफॉर्म पर भगदड़ को छिपाने की कोशिश क्यों की गई?
- ज्यादा भीड़ से निपटने के लिए इंतजाम क्यों नहीं किए गए?
- भीड़ के बावजूद क्यों बदला गया प्लेटफॉर्म?
- क्या रेलवे की नजर में यात्रियों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?
- क्या रेलवे पुलिस भी भगदड़ के लिए जिम्मेदार है?
किन्तु इन सबसे परे एक यह बात भी सोचने की है की हम भारतीय जो करुणा और दया के सागर माने जाते थे आज इतने संवेदनहीन हो गए हैं की अपनी संतति पर पाँव रखकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ने में भी हमें कोई गुरेज नहीं है. ठीक है की प्लेटफार्म बदल दिए गए पर दोनों सटे हुए ही थे और शांति से इधर उधर जाया जा सकता था. दरअसल हम अनुशाशनहीन हो गए हैं. और उससे भी ज्यादा स्वार्थी हो गए हैं. सच्चाई तो यही है की आज जो हुआ वो आगे भी होगा तबतक जबतक की हममें से हर एक अपनी जिम्मेदारी को समझाना नहीं सीख जाता. और अगर समझ में ना आये तो उनसे पूछना जिनके अपने मौत के खूनी जबड़ों से भाग्यवश बच निकले.
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची मौत की भगदड़ का शिकार हुए लोग घटना के घंटों बाद भी सदमे से उभर नहीं पाए हैं। लेकिन रेलवे प्रशासन की बेशर्मी इतनी ज्यादा हो गई है की आँखों देखि मक्खी भी निगलने से उन्हें कोई गुरेज नहीं है. प्रशासन भगदड़ की बात से साफ इंकार कर रहा है। दूसरी तरफ हादसे में अपनों को खो चुके लोग कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। शोभा के जहन में रह रह कर वो खौफनाक मंजर घूम रहा है जिसने उसकी भाभी को छीन लिया। शोभा अपनी भाभी के साथ खुशी-खुशी अपने घर भागलपुर जा रही थी तभी अचानक प्लैटफार्म नंबर 12 पर लोगों का एक ऐसा सैलाब आया जिसके तले उसकी भाभी की सांसे थम गईं। वहीं हादसे के बाद रेल प्रशासन डैमेज कंट्रोल में लग गया। आनन-फानन में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और हादसे के बाद एतिहात के तौर पर उठाए जानेवाले कदमों का बखान किया। सोमवार से प्लैटफोर्म टिकट की बिक्री नहीं होगी। इस सबके बीच रेलवे का मानना है की भगदड़ तो यात्रियों के सीढी से गिरने के चलते हुई। प्लेटफोर्म बदलने का भगदड़ से कोई लेना देना नहीं।
फिर सवाल ये उठता है की क्या भगदड़ का शिकार हुए लोग झूठ बोल रहे हैं? हर रोज नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से करीबन 300 ट्रेने चलतीं हैं। जिनमें 7 लाख यात्री सफर करते हैं। सबसे बड़ा सवाल ये की आखिर ठीकरा यात्रियों के मत्थे फोड़ने के बजाए रेलवे इस घटना से सबक क्यों नहीं लेता? ज्ञातव्य हो की नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से छुटने वाली गाड़ियों की संख्या में से करीब १५० गाड़ियां पूरब की ओर जाती हैं जिन्हें नवनिर्मित आनंदविहार रेलवे स्टेशन पर शिफ्ट करने के लिए योजना बनायीं गई थी परन्तु रेलवे की लालफीताशाही की वजह से ना तो अब तक यह स्टेशन पूरी तरह कार्य कर पा रहा है और मात्र ७ ट्रेने परिचालित हो रही हैं जिनमे से मात्र २ रोजाना चलती हैं और शेष साप्ताहिक. अब खुद ही निर्णय करें की जिम्मेदारी किसकी है. निष्कर्ष तो यही निकाला जा रहा है की लोगों के सिर पर ठीकरा फोड़ने का निर्देश किसी और का नहीं बल्कि रेल मंत्री ममता बनर्जी की तरफ से दिया गया है। ममता ने लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाए हादसे का ठीकरा उन पर ही फोड़ दिया। जी हां, नगर निगम चुनावों में व्यस्त दिल्ली से दूर कोलकाता में बैठीं रेल मंत्री के मुताबिक यात्रियों को खुद पर काबू रखना चाहिए यानि भगदड़ रेलवे की नहीं लोगों की लापरवाही की वजह से मची।
रेल मंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान .......!ऐसे हादसे होते रहते हैं..और इनको रोका नहीं सकता है....इसके लिए लोग ही जिम्मेदार हैं ! क्या बात है ...अगर यह हादसा किसी और रेल मंत्री के समय हो गया होता तो अब तक ममता बहन लाल-पीली हो कर चीखनेचिल्लाने लग जाती और जितनी भड़ास,गुस्सा निकालती वो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ...लेकिन खुद रेल मंत्री होने पर और ऐसे बयान दे कर वो अपना पल्ला झाड रही हैं.
मालूम हो कि जब रेलवे की मुखिया ही भगदड़ का ठीकरा आम आदमी के सिर फोड़ने पर आमादा हों तो बाकी अफसर तो उसी सुर में बात करेंगे। डीआरएम नई दिल्ली ने सबसे पहले चश्मदीदों के बयानों को झुठला दिया। उन यात्रियों की बात को गलत ठहरा दिया जो ट्रेन के प्लेटफॉर्म बदलने की सूचना के बाद मची भगदड़ का शिकार हुए। डीआरएम के मुताबिक ट्रेन के प्लेटफॉर्म में कोई बदलाव नहीं किया गया था।वहीं उत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने तो प्लेटफॉर्म पर किसी भगदड़ की घटना से ही साफ इंकार कर दिया। प्लेटफॉर्म पर बिखरे जूते चप्पल भले भगदड़ की घटना की साफ गवाही दे रही हो लेकिन रेलवे अपने गैरजिम्मेदाराना रवैए को ढंकने में जुट गया है। हद तो और हो गयी की जब कोलकाता में बैठ छुट्टियाँ मना रही ममता जी की ममता जाने कौन से बिल में घुस गयी की उन्होंने मात्र टी० वी० पत्रकारों को एक बाईट देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली. पहले मौत का नजराना दिया अब मृतकों को २ लाख और घायलों को पचास हजार. क्या यही कीमत है इंसानी जान की. हद है संवेदनहीनता की.
भगदड़ की घटना पर पर्दा डालने और यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश पर राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि ममता बनर्जी को यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने वाला बयान नहीं देना चाहिए था। वहीँ इस भगदड़ को देखते हुए और रेलवे की प्रतिक्रिया को देखते हुए स्विम यात्रियों ने उसी समय से प्लेटफोर्म न० १६ से जा रही ट्रेन में खुद ही कतार लगा कर प्रवेश किया.
इस हादसे के बाद एक बार फिर रेलवे के कामकाज को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं--
- प्लेटफॉर्म पर भगदड़ को छिपाने की कोशिश क्यों की गई?
- ज्यादा भीड़ से निपटने के लिए इंतजाम क्यों नहीं किए गए?
- भीड़ के बावजूद क्यों बदला गया प्लेटफॉर्म?
- क्या रेलवे की नजर में यात्रियों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?
- क्या रेलवे पुलिस भी भगदड़ के लिए जिम्मेदार है?
किन्तु इन सबसे परे एक यह बात भी सोचने की है की हम भारतीय जो करुणा और दया के सागर माने जाते थे आज इतने संवेदनहीन हो गए हैं की अपनी संतति पर पाँव रखकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ने में भी हमें कोई गुरेज नहीं है. ठीक है की प्लेटफार्म बदल दिए गए पर दोनों सटे हुए ही थे और शांति से इधर उधर जाया जा सकता था. दरअसल हम अनुशाशनहीन हो गए हैं. और उससे भी ज्यादा स्वार्थी हो गए हैं. सच्चाई तो यही है की आज जो हुआ वो आगे भी होगा तबतक जबतक की हममें से हर एक अपनी जिम्मेदारी को समझाना नहीं सीख जाता. और अगर समझ में ना आये तो उनसे पूछना जिनके अपने मौत के खूनी जबड़ों से भाग्यवश बच निकले.
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