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Showing posts from July, 2010

स्त्री

क्या तुम जानते हो एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ? बता सकते हो तुम एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ? अगर नहीं तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे एक स्त्री के बारे में….? जानने की कोशिश करो पर पहले तो बदलो अपनी दृष्टि को एक पुरुष की जगह एक पुत्र, एक भाई एक पिता बनो ओढ़ता,बिछाता,और भोगता शरीर को जीता पुरुष शरीर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता उसका प्यार-दुलार,मनुहार सभी कुछ शरीर की परिधि से बंधा होता है… लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी बहुत कुछ होती है… वह होती है जननी और सृष्टा मानव जाती की वह होती है शक्ति दुर्गा, काली, लक्ष्मी, और सरस्वती शक्ति का अपूर्व भंडार जो भरता है तुम्हारी रगों में इसलिए जितना सताओगे उतना उठुगीं जितना दबाओगे उतना उगुगीं जितना बाँधोगे उतना बहूंगी जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

दिल्ली की बारिश: डर लागे गरजे बदरिया

दिल्ली की बारिश मानो लौटरी, दिल्ली तक आते-आते बादलों का हाथ तंग हो जाता है, सो सोच समझ बरसते हैं। खैर दिल्ली में हर काम में सोचा जयादा जाता है, किया कम जाता है। चाहे वो नेता हों या जनता। बादलो को यह भाषा दिल्ली में घुसते ही समझ आ जाती है फिलहाल हाल तो हमेशा की तरह यही है की बारिश न हो तो समस्या और अगर हो जाए तो दिल्ली वालों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं।दिल्ली में मंगलवार सुबह हुई झमाझम बारिश ने दिल्ली वासियों से मुरझाये चेहरे पर खुशी की लहर ला दी. सुलगती गर्मी के आतंक से झुलसती दिल्ली ने बारिश की बुंदों से राहत की सांस ली है। सुबह हुई बारिश ने तापमान काफी कम कर दिया जिसके कारण मौसम बेहद सुहावना हो गया था. पर मंगलवार के बाद हालाँकि कल बुधवार को दिल्ली में हुई बारिश की मात्र कुछ खास नहीं मात्र २१.२ मिमी ही थी, पर इतनी ही बारिश दिल्ली की सिविक एजेंसियों की तैयारी को दिखने के लिए काफी था. दिल्लीवासियों के लिए यह एक भयावह मंजर था. मेरी एक घनिष्ठ मित्र जो की एक निजी बैंक में काम करती हैं उन्होंने बताया की जैसे ही उन्होंने डीएनडी फ्लायओवर का गेट पार किया और रिंग रोड पर पहुंची तो करीबन चा...

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो

आज काफी समय बाद थोडा चैन से बैठी हूँ . एक पुराना अखबार हाथ लगा और उसमे एक खबर थी मॉडल विवेका बालाजी की आत्महत्या की. खबर पढ़ते ही मुझे याद आ गई मधुर भंडारकर की रियल टाइम मूवी फैशन की और याद आया एक किरदार कंगना रानावत ने निभाया था. मॉडलिंग की दुनिया का वह नंगा सच जो मधुर ने दिखने की कोशिश की थी एक बार फिर नग्नता की पराकाष्ठा के साथ हमारी नजरों के सामने था. विवेका बाबजी की आत्महत्या के कारणों की बात जब भी उठती है, गौतम वोरा का नाम जरूर आता है। प्राय: सभी का मानना है कि अगर गौतम ने उसके साथ बेवफाई न की होती, तो वह आज जीवित ही नहीं, स्वस्थ-प्रसन्न होती। विवेका ने आत्महत्या की रात अपनी डायरी में लिखा था, यू किल्ड मी, गौतम। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कराह लगती है जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा हो। इसीलिए सबकी सहानुभूति विवेका के साथ है। गौतम वोरा सबकी निगाह में खलनायक हो गया है। एक पत्रकार ने तो यहां तक लिख डाला कि विवेका की जान इसलिए गई कि उसने गलत आदमी का चुनाव किया था। गौतम वोरा के अलावा कोई और नहीं जानता न जान सकता है कि विवेका के साथ उसका रिश्ता क्या था? शायद विवेका भी नहीं जानती थी।...

छिछोरेपन की राजनीति

"हड़ताल विरोध जताने की एक कालविरुद्ध विधा है" विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी बंद शायद अपने उद्देश्य में सफल रहा हो और शायद उसने बढती महंगाई पर जनता के आक्रोश को अपने पक्ष में भुनाने में आंशिक सफलता भी पायी हो किन्तु यह भी एक अटल सत्य है की जब भी आर्थिक परिस्थितियोंवश बढती महंगाई पर सरकार काबू पाने में सफल होने लगती है बस तभी एन डी ए नीत विपक्ष को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद आने लगाती है. इस बार भी ऐसा ही कुछ करने की योजना बनायीं गयी और जिसका मूर्त रूप कल देखने को मिला. महंगाई के विरुद्ध विपक्ष का "भारत बंद" कितना सफल या कितना असफल रहा, यह राजनैतिक दलों के बीच विवाद का विषय जरूर हो सकता है , लेकिन आम जनता के लिए सफलता या असफलता उसे हुई दिक्कतों के पैमाने पर ही नापी जायेगी. जिन लोगों की ट्रेन या बस या फ्लाईट रद्द हो गयी या अपने शहर में ही जरूरी काम के लिए पहुँचाना नामुमकिन हो गया उन जैसे कई लोगों के लिए ऐसा बंद या उसकी सफलता या असफलता का कोई मायने नहीं होगा. वैसे लोग जो किसी न किसी प्रकार से अपने-अपने गंतव्य पर पहुँच गए और अपनी अपनी नौकरी की उनके लि...