Skip to main content

Comments

Popular posts from this blog

शरद यादव जी आपको हुआ क्या है?

अक्सर देखा यह गया है कि कुछ लोगों की प्रकृति या कहें प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें अच्छाई में भी खोट नजर आने लगती है। किसी सही बात की तारीफ की उम्मीद तो इनसे करना बेकार है, ये तो उसमें भी मीन-मेख निकालने से नहीं चूकते। शायद ऐसी ही प्रवृत्ति जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव की भी होती जा रही है। आजकल वे बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर देते हैं या कोई मुद्दा उठा देते हैं और बाद में उन्हें मुंह की खानी पड़ती है। अपनी इसी प्रवृति का एक नया नमूना स्वनामधन्य श्री यादव ने कल पेश किया. शरद यादव ने सोमवार को फतुआ में एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए जेडी (यू) नेता और एनडीए संयोजक शरद यादव ने गांधी परिवार पर तीखे हमले किए। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए। उन्होंने कहा, ' मोतीलाल, जवाहरलाल, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी। अब एक नया बबुआ आ गया है। वह ऐसे करता है (भाषण शुरू करने से पहले आस्तीन चढा़ने की राहुल शैली की नकल उतारते हुए)। ' यादव ने कहा, ' तुमको मालूम क्या है ? कोई कागज पर लिख कर दे देता है और तुम पढ़ देते हो। तुम्हें तो उठाकर गंगा में फेंक द...

क्या बदल गया बिहार?

हिटलशाही के दौर में एक कहावत बहुत मशहूर हुई थी. एक झूठ को सौ बार बोलो, वो सच हो जाएगा. और बकायदा झूठ को प्रचारित करने के लिए हिटलर ने एक मंत्री की भी नियुक्ति की थी. ताजा उदाहरण बिहार सरकार है. विकास और सुशासन की छवि, जो यहां बनी नहीं बनाई गई है, उसमें भी इसी फॅर्मूले का इस्तेमाल किया गया है. यानि, जितना विकास हुआ नहीं उससे कहीं ज्यादा इसके बारे में लोगों को बताया जा रहा है. और,बार-बार बताया जा रहा है. जाहिर है, इसके लिए मीडिया का सहारा लिया गया और जम कर विज्ञापन बांटे गए. सूबे के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार के चार साल के कार्यकाल में करीब 65 करोड रूपये से भी ज्यादा के विज्ञापन विभिन्न अखबारों और न्यूज चैनलों को बांटे गए. जाहिर है, बुलबुल भी वैसी ही नाचेगी जैसे पैसा देने वाला चाहता है. हुआ भी ऐसा ही. करोडों का विज्ञापन लेने के बाद मीडिया ने भी बिहार की ऐसी छवि बनाई मानो सचमुच बिहार अब भूखमुक्त,भयमुक्त, भ्रष्टाचरमुक्त हो गया है.मीडिया ने नीतीश कुमार की जितनी बड़ी छवि गढ़ी है, बिहार की जनता ने उससे कई गुना बड़ा जनादेश उनको दिया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार विधानसभा में...

हिमालय में जारी शह और मात का खेल

सैन्य और राजनयिक स्तर की मैराथन वार्ताओं के बावजूद, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव के धीरे-धीरे समाप्त न होने की हालत में, प्रत्येक हितधारक के सम्मुख एकस्पष्ट प्रश्न यह है: क्या 2020 दूसरा 1962 है? जबकि भविष्य अनिश्चित है, वर्तमान निस्संदेह तनावपूर्ण है। जैसा कि भारत के विदेश मंत्री एस। जयशंकर ने कहा, यह "निश्चित रूप से सबसे गंभीर स्थिति है" भारत-चीन सीमा पर "1962 के बाद"। समानताओं को अनदेखा करना कठिन है। अगस्त 1959 में, पूर्वी क्षेत्र में लोंग्जू में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पहली बार सीमा संघर्ष के बाद, चीन ने कहा कि भारतीय सैनिकों ने मैकमोहन रेखा को पार किया और गोलियां चलाईं और चीनी सीमा रक्षकों ने गोलीबारी की। अगले दिन, नई दिल्ली ने चीनी बयान का विरोध करते हुए कहा कि यह चीनी सेना थी जो भारतीय क्षेत्र में चली गई और आग लगा दी। साठ-सत्तर साल बाद, भारत और चीन ने सीमा-विवाद के बाद जो बयान जारी किए हैं, वे बिल्कुल इसी तरह के हैं। दोनों पक्ष एक दूसरे पर LAC के पारगमन का आरोप लगाते हैं। दोनों पक्ष एक दूसरे पर आग लगाने का आरोप लगाते हैं। ...