भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भाषण करते-करते बहक गए और गाली-गलौच कर गए। गाली-गलौच भी किया तो किनसे खाली बैठे लालू और मुलायम सिंह यादव से। जिनके पास उनकी खुद की राजनीति के लिए मुद्दों का अकाल पड़ा हुआ है. अब गडकरी जी ने उन्हें अपनी एडियाँ ऊँची करने के लिए राजनीति की जमीन दे दी है पर शायद इन यादव द्वय को इतनी सी बात याद नहीं रही है की एडियाँ ऊँची करने से कद ऊँचा नहीं हो जाता है. दरअसल चंडीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने लालू और मुलायमसिंह को जिन अलंकारिक शब्दों का प्रयोग किया, अगर वे तथा उनके गुर्गे भी ऐसे ही मधु भरे रसास्वादन शब्द आपको भी कह दे तो बताओ कैसे लगेगा? (वैसे मुलायम जी की और से मोहनसिंह जी ने अपना वाकतीर छोड़ दिया है) चले हैं राजनीति के बाजपेयी तथा राहुल बनने के लिए और इनके भाषण इतने निम्न स्तर के ! जोश में होश खो देना एक अच्छे लीडर शिप की पहिचान नहीं हो सकती है ! ऊंची कुर्सी वह भी देश की कभी नंबर वन कभी नंबर टू पार्टी ! मजे की बात तो यह है की यह वह पार्टी है जिसने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं, आचार-व्यवहार, भाषा का जिम्मा अपने कन्धों पर ले रखा है, उसका पार्टी अध्यक्ष ऐसे अशोभनीय और अपशब्दों का प्रयोग करता है, जिसको कहा गया, उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा लेकिन नितिन गडकरी जी आपकी जवान गंदी हो गयी ! वे भले आपको माफ़ कर दें लेकिन देश की जनता आप को माफ़ नहीं करेगी ! अब तीर कमान से निकल गया है तो गडकरी जी की तो उनकी इस हरकत पर पार्टी और खुद गडकरी कह रहे हैं कि उन्होंने तो बस मुहावरे बोले हैं। अगर सचमुच उन्होंने ये मुहावरे ही कहे हैं तो बड़ी चिंता की बात है। उस स्कूल का पता लगाना चाहिए जहां हिन्दी के नाम पर ऐसे मुहावरे पढ़ाए जा रहे हैं। उस स्कूल को तत्काल बंद करवाया जाना चाहिए। उन्होंने चंडीगढ़ में पत्रकार सम्मेलन के दौरान क्या नए मुहावरे वोले आओ इसका विश्लेषण कर लेते हैं:-लालू यादव और मुलयम के बारे में उन्होंने कहा कि दोनों चापलूस हैं-ये कुत्ते की तरह कांग्रेस के तलवे चाट रहे हैं- -तलवे चाटना- मुहावरा है मगर कुत्ते की तरह तलवे चाटना उन्होंने जिस स्कूल में पढ़ा है, उस स्कूल को दंडित किया जाना चाहिए।
इस तरह एक अन्य वाक्य जिसे भी वह मुहावरा बता रहे हैं यह है कि -कांग्रेस में अगर कोई मर्द की औलाद है तो मेरे सवालों का जवाब दे-
माई का लाल मुहावरा है, मर्द की औलाद मुहावरा तो नहीं है, कम से कम हमने किसी स्कूल में नहीं पढ़ा। हां, मुंबइया फिल्मों में गाली की तरह जरूर इस्तेमाल होता है। यह इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब मां की महिमा कम करनी हो या उसे गाली देनी हो। मां को गाली देने वाले मुहावरे वे कहां पढ़ कर आए हैं। ये सब मुहावरे किस स्कूल में पढ़ कर आए हैं यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। कम से कम और बच्चों को यह सब सीखने से बचाया जा सके।
दरअसल मेरा मानना है की अब भाजपा भी अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना और उसकी संतति मनसे से राजनितिक जमीन बचाने के लिए उनकी ही जैसी गाली गलौज की भाषा का इस्तेमाल कर रही है. मुझे याद है की मैं अपने स्कूल और कोलेज के दिनों में भी खास तौर पर जब म० अटलजी के व्याख्यानों को सुनने के लिए अपने क्लास बंक किया करती थी. पुरे टाइम रेडिओ पर या टीवी पर कान गडाए बैठी रहती थी खासकर जब संसद में कोई प्रकार की बहस चल रही होती थी. अटलजी, सुष्माजी, प्रमोद महाजन जी, उमा भारती सरीखे वक्ता हुआ करते थे उस पार्टी में. पता नहीं विचारों का अकाल तो था ही अब संस्कारों का भी अकाल आ गया है भाजपा में. और गडकरी जी जैसे नेता का बचाव जोशीजी, लालजी टंडन जैसे प्रथम श्रेणी के नेता कर रहे हैं. मेरा मानना है की दरअसल गडकरी जी मुहावरों से छेड़छाड़ कर कुछ और कहना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं महाराष्ट्र में वाहवाही लूटने के लिए उनका मराठी मानुष जाग गया हो और उत्तर भारतीय नेताओं के लिए गाली अनजाने ही उनके मुहवरों से जुड़ गई हो। ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि वे आजकल महंगाई को लेकर प्रधानमंत्री से लगातार सवाल कर रहे हैं, पर ऐसा एक भी शब्द कृषिमंत्री शरद पवार के लिए नहीं बोल रहे। अपने इस मराठी भाई के लिए अभी तक ऐसा एक भी मुहावरा उनके मुंह से नहीं निकला।
भाई गडकरी जी अब आप राष्ट्रीय अध्यक्ष हो वो भी एक राष्ट्रीय पार्टी के । कम से कम मुहावरों की अपनी जानकारी ठीक करो। अगर आप किसी को गालियां देना ही चाहते हो तो दो, मगर उसका ठीकरा भाषा के सिर मत फोड़ो। इससे भाषा की बहुत किरकिरी और बदनामी होती, आपकी होती है पता नहीं, क्योंकि आप तो खुद अध्यक्ष हो। या कहीं ऐसा तो नहीं की स्वनामधन्य महारैली के चक्कर में जब आप बेहोश हुए तो कही इस चिलचिलाती गर्मी का असर अभी तक बाकी है. खैर हम तो यही कहेंगे भैया जबान सम्हाल के क्यों की होली का टाइम तो निकल गया वरना होली के बहाने शायद गडकरी जी बच गए होते यह कह कर की " बुरा न मानो होली है
इस तरह एक अन्य वाक्य जिसे भी वह मुहावरा बता रहे हैं यह है कि -कांग्रेस में अगर कोई मर्द की औलाद है तो मेरे सवालों का जवाब दे-
माई का लाल मुहावरा है, मर्द की औलाद मुहावरा तो नहीं है, कम से कम हमने किसी स्कूल में नहीं पढ़ा। हां, मुंबइया फिल्मों में गाली की तरह जरूर इस्तेमाल होता है। यह इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब मां की महिमा कम करनी हो या उसे गाली देनी हो। मां को गाली देने वाले मुहावरे वे कहां पढ़ कर आए हैं। ये सब मुहावरे किस स्कूल में पढ़ कर आए हैं यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। कम से कम और बच्चों को यह सब सीखने से बचाया जा सके।
दरअसल मेरा मानना है की अब भाजपा भी अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना और उसकी संतति मनसे से राजनितिक जमीन बचाने के लिए उनकी ही जैसी गाली गलौज की भाषा का इस्तेमाल कर रही है. मुझे याद है की मैं अपने स्कूल और कोलेज के दिनों में भी खास तौर पर जब म० अटलजी के व्याख्यानों को सुनने के लिए अपने क्लास बंक किया करती थी. पुरे टाइम रेडिओ पर या टीवी पर कान गडाए बैठी रहती थी खासकर जब संसद में कोई प्रकार की बहस चल रही होती थी. अटलजी, सुष्माजी, प्रमोद महाजन जी, उमा भारती सरीखे वक्ता हुआ करते थे उस पार्टी में. पता नहीं विचारों का अकाल तो था ही अब संस्कारों का भी अकाल आ गया है भाजपा में. और गडकरी जी जैसे नेता का बचाव जोशीजी, लालजी टंडन जैसे प्रथम श्रेणी के नेता कर रहे हैं. मेरा मानना है की दरअसल गडकरी जी मुहावरों से छेड़छाड़ कर कुछ और कहना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं महाराष्ट्र में वाहवाही लूटने के लिए उनका मराठी मानुष जाग गया हो और उत्तर भारतीय नेताओं के लिए गाली अनजाने ही उनके मुहवरों से जुड़ गई हो। ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि वे आजकल महंगाई को लेकर प्रधानमंत्री से लगातार सवाल कर रहे हैं, पर ऐसा एक भी शब्द कृषिमंत्री शरद पवार के लिए नहीं बोल रहे। अपने इस मराठी भाई के लिए अभी तक ऐसा एक भी मुहावरा उनके मुंह से नहीं निकला।
भाई गडकरी जी अब आप राष्ट्रीय अध्यक्ष हो वो भी एक राष्ट्रीय पार्टी के । कम से कम मुहावरों की अपनी जानकारी ठीक करो। अगर आप किसी को गालियां देना ही चाहते हो तो दो, मगर उसका ठीकरा भाषा के सिर मत फोड़ो। इससे भाषा की बहुत किरकिरी और बदनामी होती, आपकी होती है पता नहीं, क्योंकि आप तो खुद अध्यक्ष हो। या कहीं ऐसा तो नहीं की स्वनामधन्य महारैली के चक्कर में जब आप बेहोश हुए तो कही इस चिलचिलाती गर्मी का असर अभी तक बाकी है. खैर हम तो यही कहेंगे भैया जबान सम्हाल के क्यों की होली का टाइम तो निकल गया वरना होली के बहाने शायद गडकरी जी बच गए होते यह कह कर की " बुरा न मानो होली है
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