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निरुपमा हमें माफ़ करना

आज कई दिनों के बाद मन काफी उदास सा लगता है. पिछली २९ अप्रैल से जब से निरुपमा पाठक की मृत्यु या यूँ कहें की हत्या का समाचार सुना तब से जाने मन में एक अजीब सी घिन घर कर गई है. लगता है शायद रिश्तों की कीमत नहीं रह गयी है. भावनाए शुन्य में विलीन हो गयी है. ग़ालिब की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं.
"हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है"
शायद यही सोच रही होगी निरुपमा की आत्मा, अगर कहीं होगी तो, खुद को उसकी जगह रखकर देखती हूँ तो महसूस होता है. कैसी नारी छली जाती है अपनों के ही हाथों. निरुपमा केवल एक लड़की नहीं थी वो तो एक सोच थी. एक आम हिन्दुस्तानी लड़की की तरह जो अपने परिवार को बेहद प्यार करती थी. और प्यार करती थी उसको जिसके संग उसने जीवन बिताने के सपने देखे थे. एक आम लड़की की तरह अपने पिता के बेहद करीब और बहुत दुलारी. माँ की आँखों का तारा. भाइयों की लाडली. पर क्या सबने अपना कर्त्तव्य निभाया. वो तो अपने रिश्तों के प्रति इतनी वफादार निकली की अपने प्रेम को सामजिक मर्यादा दिलाने के लिए मात्र अपने गृहनगर चली गयी ताकि अपने जनकों की स्वनामधन्य मर्यादा को आंच ना आने दे. और उन्होंने क्या किया अपनी ही संतति को अपनी झूठी नाक की बलिवेदी पर चढ़ा दिया. और उसके भाई जिन्होंने रक्षासूत्र बांधकर उसकी रक्षा का प्रण लिया था स्वयं ही उसके भक्षक बन बैठे. आज पूरा चिटठाजगत दो फाड़ हो गया है कोई निरुपमा के जनकों को दोष दे रहा है तो कोई उसके प्रेमी को. पर कोई तो सोचे की निरुपमा क्या सोचती होगी. अरे सनातन धर्म के रखवालों किसी ने सनातन धर्मं का अर्थ भी समझा है. क्या किसी ने भी कभी ये सोचा की राम, कृष्ण इनके साथ कोई जातिसूचक शब्द नहीं लगा था. जिन राधा कृष्ण की पूजा करते हम अपना सर्वस्व न्योछावर करने की सोचते हैं. क्यों नहीं हम अपने बच्चों को उन राधा कृष्ण की तरह अपना जीवन बिताने की स्वतंत्रता देते हैं. निरुपमा ने तो सनातन धर्मं के अनुरूप आचरण ही किया. जब श्रीरामचंद्र जी ने धनुष भंग किया तो यह स्पष्ट था की उनका विवाह सीताजी से होगा पर फिर भी दोनों ने अपने अपने गुरुजनों की सहमती के हेतू उनकी और देखा. उनके पिता श्री दशरथ जी को तो बाद में समाचार मिला था ना की दशरथ जी ने राम जी का विवाह तय किया था. और अगर सनातन धर्मं की यही परंपरा है तो निरुपमा के गुरुजन भी उसके फैसले से तो परिचित थे. निरुपमा ने भी जिसे अपना मन समर्पित किया उसे ही अपना तन समर्पित किया. कोई गाँव की अनपढ़ गंवार तो थी नहीं वह. उसने अपने प्रेम की परिणति को अपनी संतति बनाने के हेतु उसका पालन करने का निश्चय किया. पर हाय रे माँ जिसकी कोख से निरुपमा जन्मी उसी को दया नहीं आई. न अपनी जाई पर न उसकी अजन्मी औलाद पर.
सोचने वाली बात है की एक बेटी ने अपने माँ बाप की मर्यादा का ख्याल तो रखा पर वो निर्मोही माँ बाप अपनी मर्यादा को खुद अपने पैरों के निचे रौंद गए. दरअसल कोई धर्मं नहीं कोई मर्यादा नहीं. बस फर्क सिर्फ इतना है की हमने अपने आप को जिन दीवारों में कैद कर रखा है उससे बाहर निकलने की कोशिश है विद्रोह और सजा है मौत. लगता तो यही है की स्त्री का कोई धर्म नहीं होता और धर्म ने उसके लिए सिर्फ बेड़ियां बनाईं हैं, और धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं, और....सब मंजूर, सब सही। पर हम कब तक पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? क्या अब समय नहीं आया कि एक बार अपनी तरफ नजरें घुमाएं, अपने भीतर देखें। एक बार!
निरुपमा के लिए ऐसे हालात क्योंकर बने, लेकिन यह जानते हैं कि निश्चित रूप से उसका पालन इस भरोसे के साथ नही हुआ था कि माता- पिता उसके साथ हर मोड़ पर हैं।यह बड़ी बात है।कितनी लड़कियाँ हैं जो इस तरह से पाली-पोसी ही नही जातीं कि वे ऐसे नाज़ुक मोड़ पर फैसले ले सकें।आप और मैं भी शायद उम्र के इस मुकाम पर आकर समझ पा रहे हैं कि स्त्री के इर्द गिर्द बुना गया दुष्चक्र क्या है, क्यों है?
यह पुरुष से मुखातिब होना भर नही है कि हम धर्म के स्त्री के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल होने की बात कर रहे हैं , यह खुद अपनी डीलर्निंग के लिए बेहद ज़रूरी है कि हम स्त्रियाँ यह समझें कि किन बातों पर ईमोशनल नही होना है क्योंकि उनका अस्तित्व स्त्री को दबाने के लिए ही है।यह कहा जा सकता है कि ऊंची शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़की भी वक्त पड़ने पर तार्किक तरीके से ,धर्म की बनाई वर्जनाओं और नियमों से मुक्त होकर फैसले नही ले पाती ।इसलिए बेहद ज़रूरी है कि अपने 'बनने'को वे समझें और उलटने का साहस जुटाएँ।यह तब तक नही होगा जब तक माता-पिता उनका पालन पोषण परायी अमानत या अपनी जागीर की तरह करते रहेंगे।इस नज़र से मै हमारी शिक्षा पद्धति मे भयंकर दोष मानती हूँ कि वह इस एक जेन्डर के मोर्चे पर अब भी नाकाम साबित हो रही है! पर एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है की क्या प्रियाभान्शु का कोई अपराध नहीं है. निरूपमा की मौत के बाद रह-रहकर एक सवाल मेरे जेहन में बार-बार आ रहा है कि इस देश में ऐसे न जाने कितने प्रियभांशु होंगे, जो अपने रिश्ते को एक नाम देने से घबराते हैं। महानगर में रहना, वहां का स्वतंत्र जीवन जीना और परिवार से दूर रहकर खुद के लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना किसने अच्छा नहीं लगता। जरूर रहो, मजे में रहो, लेकिन उससे कई जिम्मेदारियां भी साथ जुड़ती चली जाती हैं। एक जिम्मेवारी ये रहती है कि आप जिससे रिश्ता रख रहे हैं, उस रिश्ते के प्रति आपमें कितना समर्पण है। जब निरूपमा को ये पता चला होगा कि उसके पेट में गर्भ है, तो क्या उसके दिल में ममता का ज्वार नहीं फूटा होगा? तब क्या उसने अपने अब तक के रिश्ते को एक कदम आगे बढ़कर विवाह जैसे संस्कार से जुड़ने की बात नहीं की होगी। मुझे प्रियभांशु के शोकाकुल चेहरे में कोई ऐसा दर्द नजर नहीं आता, जिसके लिए मैं उसके साथ न्याय के लिए आवाज बुलंद करूं। हां निरूपमा के हत्यारों को सजा देने की मांग जरूर करती हूं, लेकिन प्रियभांशु के साथ न्याय की गुहार लगानेवालों में कभी शामिल नहीं होउंगी । क्योंकि मुझे ऐसे में एक वैसे शख्स का साथ देने का गुनाह नजर आता है, जो अपनी जिम्मेवारियों से लगातार भागता रहा। उसने रिश्ते के नाम पर उस लकीर को पारकर लिया,जिसके बाद एक महिला तीसरे रिश्ते मातृत्व की ओर आगे बढ़ती है। अगर रास्ते में इतनी लंबी दूरी कर ली थी, तो प्रियभांशु से सवाल वही है कि रिश्ते को एक नाम देने में देरी क्यों की।
टीवी पर यह कहकर कि उसे निरुपमा के प्रेग्नेंट होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था उसने न केवल अपने प्रेम को लांक्षित किया बल्कि अपनी मर चुकी प्रेमिका को भी कठघरे में खड़ा किया है। हम कैसे मान लें कि तीन महीने का गर्भ पालने का निर्णय उसका खुद का रहा होगा और उसने इसे इस बारे में कुछ नहीं बताया था। फिर वो कौन सी मजबूरी है जो इस तथाकथित भोले बालम को साहस के साथ सच को स्वीकारने का हौसला नहीं दे रही कि निरुपमा की कोख में उसके ही प्यार का अंश था।

निरूपमा की हत्या दो दिन बाद से ही प्रियाभंशु के खिलाफ तथाकथित शुचितावादी लोगों ने मोर्चा खोल दिया था। बिना उससे बात किये, उसका पक्ष जाने लोगों ने दोषी करार दे दिया। उसे एक खूबसूरत टैलेंटेड लड़की को अपनी प्रेमिका बनाकर दोस्तों के बीच रुआब गांठने वाली फितरत का कायर घोषित कर दिया। लेकिन प्रियभांशु मुझे तो लगता यही है की तुम भी जान बुझ कर उनका अनगढ़ सत्य स्वीकार कर उन लोगों को सही ठहराने पर उतारू हो। तुमने क्यों इतने विपरीत हालात में उसे अकेली मरने के लिए हत्यारों के बीच भेज दिया। उसके लगातार आ रहे एसएमएस ने तुम्हें कोई आभास नहीं दिया कि उसके साथ क्या कुछ हो सकता है। तुम उसकी मौत का बोझ कैसे उठाओगे ।

टीवी पर निरुपमा के भाई का चेहरा देखे तो उनकी आंखों में अब भी अपने परिवार की इज्जत बचा ले जाने का अभिमान साफ पढ़ा जा सकता है।। जिस बच्ची को पालपोस कर इतना बड़ा किया उसका दम घोंटते हुए हाथ उसकी मां के हों या उसके भाइयों या बाप के अब कोई फर्क नहीं पड़ता। निरुपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं हैं। क्योंकि इस विकल्पहीन समय में हम अब भी तुम्हारे हत्यारों के साथ रहेंगे। स्थानीय पुलिस भी तुम्हारे इज्जतदार परिवार का ही साथ देगी शायद और तुम्हारी मौत का कोई निशाँ बाकी नहीं रह जाएगा लोगों के जेहन में। कोर्ट ने तुम्हारी मां को तीन दिन के लिए पैरोल पर छोड़ा है जानती हो क्यों! ताकि वो तुम्हारे अंतिम संस्कार में शामिल हो सके।

मतलब साफ़ है निरुपमा की मौत का गुनाहगार जितना उसके घर वाले है , उतना ही जनाब -प्रियभान्शु भी, जिसने निरुपमा के सामने ऐसी परिस्तिथियाँ खड़ी कि जिसकी वज़ह से उसकी मौत हुई ...बुद्धिजीवियों से अनुरोध है, उस परिवार का भी दर्द समझे जिससे निरुपमा ताल्लुकात रखती थी। ज़नाब आप लोगों कि भी बेटियां है, बहने हैं .....समझने की कोशिश करें संस्कार और संस्कृतियों को ठेंगा दिखा कर आप प्रगतिशील नहीं कहलायेंगे ।

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