काश के मैं बच्ची ही होती
न देखती जाति धर्मं मैं
न सामाजिक प्रतिष्ठा की बलि चढ़ती
जब दिल करता तब मैं हंसती
जब दिल दुखता मैं रो जाती
काश के मैं बच्ची ही होती.
न झेलती मैं छल- कपट
मात्र किसी के जीवन-यापन के लिए
न पाती दुर्व्यवहार किसी से
सिर्फ उसके पेट-पोषण के लिए
भूख लगे पर पी मात्रीक्षिर
उनके गोदी में सो जाती
उनके स्नेह की छाया पाती
काश के में बच्ची ही होती
न करती मैं आपाधापी
इस अर्थयुग की अंधी दौर में
मात्र सफल होने के लिए
न जाती उलटे छोर मैं
रिश्तों की स्नेहवर्षा में भीगकर
आनद का चरम पाती मैं
न दुखित होती मन ही मन
देख लुप्त होती मानवता का भाव
काश के सबका शैश्त्व न जाता
सुख शान्ति होती सबके द्वार पर
निश्चल निष्पापी बन रहते सब
खुश रहती यह सृष्टि भी
काश के मैं बच्ची ही होती.
न देखती जाति धर्मं मैं
न सामाजिक प्रतिष्ठा की बलि चढ़ती
जब दिल करता तब मैं हंसती
जब दिल दुखता मैं रो जाती
काश के मैं बच्ची ही होती.
न झेलती मैं छल- कपट
मात्र किसी के जीवन-यापन के लिए
न पाती दुर्व्यवहार किसी से
सिर्फ उसके पेट-पोषण के लिए
भूख लगे पर पी मात्रीक्षिर
उनके गोदी में सो जाती
उनके स्नेह की छाया पाती
काश के में बच्ची ही होती
न करती मैं आपाधापी
इस अर्थयुग की अंधी दौर में
मात्र सफल होने के लिए
न जाती उलटे छोर मैं
रिश्तों की स्नेहवर्षा में भीगकर
आनद का चरम पाती मैं
न दुखित होती मन ही मन
देख लुप्त होती मानवता का भाव
काश के सबका शैश्त्व न जाता
सुख शान्ति होती सबके द्वार पर
निश्चल निष्पापी बन रहते सब
खुश रहती यह सृष्टि भी
काश के मैं बच्ची ही होती.
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