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कोरोना काल और दम तोड़ता बचपन

बड़ी-बड़ी बातें केवल कुठाराघातें
बाल श्रम अनवरत निरंतर आघातें

समाज का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं हैं जहाँ बच्चों से काम नहीं लिया जाता हो और न ही कोई ऐसा कोई धंधा है, जहाँ मालिक बच्चों का शोषण न करता हो । आज आसमान छूती महंगाई में भी इन्हें इतनी कम मजदूरी मिलती हैं की इनके लिए ठीक तरह से जीवन-यापन भी कठिन होता है। बाल श्रमिकों से जोखिमपूर्ण एवं आपराधिक कार्य कराया जाना भी उनके शोषण का एक ओर बदतर पक्ष हैं।
12 जून को वर्ल्ड डे अगेंस्ट चाइल्ड लेबर होता है यानि अंतरराष्ट्रीय बाल मजदूरी निषेध दिवस. ये दिन बाल मज़दूरी की समस्या, और इससे बच्चों को कैसे निकाला जा सकता है, उस पर फोकस करता है. याद कीजिये 12 साल की जमालो मड़कामी को जो पैदल तेलंगाना से चलते हुए बीजापुर जाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन भूख और प्यास से चलते चलते दम तोड़ दिया. देश में बाल मजदूरी की समस्या ऐसे ही बड़ी थी, लेकिन लॉकडाउन ने मुसीबत और बढ़ा दी है. गरीब परिवार, और गरीब हो गए हैं, मजदूरों के बच्चों के स्कूल  छूटे हैं, उनकी किताबें रूठी हैं, उनके सपने टूटे हैं.
कलम पकड़ने की उसकी उम्र थी साहब
जिम्मेदारियों ने मजदूर बना दिया उसे।
शहरी इलाकों में अनलॉक के शुरुआती दौर में ही बाल मजदूरी के मामले दिखाई देने लगे है | कई लोगों ने अपने घरों और दुकानों में निर्माण कार्य शुरू किये है | कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर खाद्य पदार्थों का निर्माण भी शुरू हुआ है | इसके अलावा घरेलु उद्योगों के तहत निर्मित होने वाली वस्तुओं के उत्पादन ने भी जोर पकड़ना शुरू कर दिया है | इन इलाकों में अब बाल मजदूर भी नज़र आने लगे है | कई श्रमिक अपने परिवार सहित काम पर जुट गए है | उनमे इन श्रमिकों के बच्चे और रिश्तेदार शामिल है | ये मजदूर रोजीरोटी के संकट का हवाला देकर नाबालिग बच्चों से काम काज करवाने पर जोर दे रहे है | लॉक डाउन की वजह से ज्यादातर इलाकों में प्रवासी मजदूरों का पलायन हो गया है | ऐसे में काम काज के लिए स्थानीय मजदूर सामने आये है। ये मजदूर व्यापारिक गतिविधियों वाले केंद्रों, कल-कारखाने से लेकर कुटीर उद्योग केंद्रों में अपनी आमद दर्ज कर रहे है | ये मजदूर खुद के बेरोजगार होने और उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़े होने की जानकारी देकर पूरे परिवार को मजदूरी के कार्य में झोक रहे है। अभी फिलहाल ऐसे संकेत सामने आ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे अपेक्षाकृत ज्यादा पिछड़े राज्यों में कोरोना काल में गरीबी बढ़ सकती है। औद्योगिक गतिविधयों के धीमेपन का असर लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ सकता है। इससे इन राज्यों के गरीब लोग अपने बच्चों को बाल मजदूरी के लिए भेजने पर मजबूर हो सकते हैं।
वर्ल्ड बैंक के नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष विश्व भर में चार से छह करोड़ व्यक्ति गरीबों की कतार में शामिल हो जाएंगे। इस का सीधा सीधा असर बच्चों पर पड़ता है। बेरोजगारी के कारण गरीबों और उनके परिवारजनों के सामने भुखमरी का संकट मंडरा रहा है। आने वाले दिनों में इस संकट के और गहराए जाने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही है। कोरोना महामारी और इसके नतीजे में विश्वव्यापी तालाबंदी के नतीजे में बाल तस्करी की घटनाओं में लगातार बढ़ोत्तरी नजर आ रही है। चाइल्ड ट्रैफिकिंग की इन बढ़ती घटनाओं को लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी।। इन्हीं दिनों एक और खबर में ध्यान खींचा था जिसमें की ऑनलाइन चाइल्ड पॉर्न की मांग में बेतहाशा वृद्धि देखी गई थी। वैसे तो बाल तस्करी कि समस्या तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद प्रशासन की नाक के नीचे हल्की-फुल्की रही है लेकिन आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि जब भी ऐसी किसी महामारी की वजह से गरीबी बढ़ने में तेजी आती है तो इसके बाद बाल तस्करी के मामले बहुत तेजी से बढ़ते हैं। अनुमान है कि कोरोना महामारी के कारण इस साल करीब 6 करोड़ बच्चे गरीबी में धकेले जा सकते हैं इनमें से अधिकांश को बाल श्रम के दलदल में जानते बूझते उतरना ही पड़ेगा। 
भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार करीबन 30 करोड बच्चों को मिड डे मील दिया जाता है अब इस महामारी के कारण इनमें से कितने ऐसे बच्चे होंगे जिनका स्कूल छूट जाएगा और एक बार स्कूल छूटने के बाद दोबारा स्कूल आने की संभावनाएं नगण्य हो जाती है हैं। कोरोना महामारी का अधिकतम प्रभाव सामाजिक एवं शैक्षणिक रुप से पिछड़े एवं कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है जो परिणाम था उनकी गरीबी को और ही ज्यादा बढ़ाएगा। जो हालत दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के पिछड़े इलाकों के बच्चों की हो रही है तकरीबन वैसा ही हाल भारत में प्रवासी श्रमिक परिवारों और उनके बच्चों के साथ होने की संभावना भी नकारी नहीं जा सकती है।
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में एक करोड़ से अधिक बाल श्रमिक विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे थे।यूनिसेफ का अनुमान है कि किसी देश की गरीबी में अगर एक फीसदी की बढ़ोतरी होती है, तो इससे बालश्रम के मामलों में 0.7 फीसदी की बढ़ोतरी होने की आशंका बढ़ जाती है। कोरोना काल में गरीब देशों में इसका व्यापक नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है। इस सूची में भारत काफी संवेदनशील बताया जा रहा है। आज भी अकेले बिहार में 10.88 लाख बाल श्रमिक विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। यह संख्या भारत के कुल बाल श्रमिकों की लगभग 10.7 फीसदी है। भारत ने वर्ष 2025 तक देश से बाल श्रम मजदूरी को समूल नष्ट करने की प्रतिबद्धता जाहिर कर रखी है। लेकिन लॉक डाउन से उत्पन्न परिस्थिति इसके सफाये को लेकर बड़ी चुनौती बन गई है |
 अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त 16 करोड़ से अधिक बच्चे बाल श्रम करने को मजबूर हैं और इनमें से 7 करोड़ खतरनाक परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। यूनिसेफ ऐसा मानती रही है दुनिया भर में बच्चों को श्रम कार्यों में इसलिए लगाया जाता है ताकि उनका शोषण आसानी से हो सके। हालांकि गरीबी बाल तस्करी का महत्वपूर्ण कारण है किंतु शिक्षा का अभाव भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है।
विडंबना यह है इस देश में विकास कार्यक्रमों के लिए निर्धारित राशि में से सिर्फ 2% शिक्षा पर और 1% स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। पूरी दुनिया में  पिछले 18 सालों से 12 जून को बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जा रहा है लेकिन बच्चों की समस्याओं में कोई कमी नजर नहीं आई है उल्टे खेलने कूदने की उम्र में अभी भी लाखों बच्चे कश्मीर से कन्याकुमारी तक खतरनाक काम धंधा में जुड़े हुए हैं। बचपन शारीरिक श्रम की भट्टी में रोज-रोज झुलसता जा रहा है और नतीजे में आंख ह्रदय और सांस के रोग उपहार में देता जा रहा है।
अब जबकि हालात बद से बदतर हो चुके हैं यह बहुत ही जरूरी है कि इस असामान्य हालत में बाल मजदूरी को ना बढ़ने देने के लिए कुछ जरूरी इंतजामात किए जाएं।
हालात सामान्य होने के बाद सभी बच्चे स्कूल दोबारा से लौट पाए इसकी सबसे अधिक तैयारी करनी होगी।
बाल श्रम से बचाव के लिये परिवारों को रोजगार सुनिश्चित कराना भी जरूरी है। इसके लिए सरकार को हर संभव कदम उठाना पड़ेगा ताकि राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चे खतरे में ना पड़े।
स्कूल खोलने से पहले और उसके बाद भी बच्चों को दिया जाने वाला मिड डे मील, प्रोत्साहन राशि और स्कॉलरशिप वगैरा किसी भी सूरत में जारी किया जाना चाहिए।
शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक के सस्ते एवं सुलग प्रयोगों द्वारा इसे गरीबों और पिछड़े वर्गों के लिए मुफीद बनाना होगा ताकि वह शिक्षा से जुड़े रहने की अपनी हिम्मत बनाए रखें।
राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा श्रम कानूनों में ढील दिए जाने से बाल मजदूरी में बेतहाशा वृद्धि होने की सबसे अधिक संभावना है। इसलिए किसी भी सूरत में बाल मजदूरी से संबंधित कानूनी प्रावधानों को ढीला नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी सूरत में किसी भी इंडस्ट्री में बाल मजदूरों का नियोजन नहीं किया जा सके। ऐसा किए जाने पर कठोर दंड तथा उस उद्योग का बहिष्करण किए जाने का प्रावधान करना होगा।
दूरदर्शी और निर्णायक नेतृत्व का सबसे बड़ा पैमाना है कि वह अपनी नीतियों और योजनाओं में बाल श्रम को कितनी प्राथमिकता देता है। इसलिए यह अत्यंत जरूरी है की नीति नियंताओं के स्तर पर अगर ऐसी कोई ढिलाई बरती जा रही है तो इसको लेकर आंदोलन के स्तर तक भी कार्रवाई करने से ना हिचका जाए।
भारतीय संविधान में बाल श्रम पर रोक लगाई गई है । हमारे मौलिक अधिकारों के अध्याय 3 में अनुच्छेद 23 के अंतर्गत बेगार पर निषेध लगा दिया गया है, अर्थात कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से बलात काम नहीं ले सकता । अनुच्छेद 24 में प्रावधान किया गया है कि चौदह वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे को किसी कारखाने  या खदान या अन्य किसी खतरनाक रोजगार में नियोजित नहीं किया जाएगा । संविधान के संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय से एस विपदा के समय यह अपेक्षा की जाती है कि ऐसी आपदा के समय में इन प्रावधानों के उल्लंघन ना किए जाने को सुनिश्चित करें।
बाल मजदूरी गरीबी और अशिक्षा परस्पर समावेशी चरित्र की 3 ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान एक दूसरे के साथ ही संभव हो सकता है। लेकिन अभी तत्काल हमें ध्यान देना होगा क्योंकि परिवार में उपजी आर्थिक तंगी की भरपाई करने के लिए बच्चों को अकुशल श्रम में धकेले जाने की एक आशंका है। जिन घरों में भी पैसे को लेकर परेशानियां होंगी, वहां बच्चे पढ़ाई के बदले अपने घर की मदद करने के लिए काम को चुन सकते हैं। कोरोना वायरस संकट के बाद घरों से चल रहे कामकाजों, कृषि और जोखिम भरे पेशों में बाल श्रम में बढ़ोतरी हो सकती है। इसलिए, बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पैमाने पर सुरक्षा संबंधी कदम तत्काल उठाये जाने की आवश्यकता है।

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