किसी भी राजनेता का आकलन उसके भाषण देने की कला के आधार पर नहीं बल्कि सवालों के जवाब देने के की क्षमता के आधार पर होना चाहिए। भाषण देना एक तरह का लाइव परफॉरमेंस है।
अगर आप में अभिनय की नैसर्गिक प्रतिभा है या आप उसे अभ्यास से निखारने के लिए प्रतिबद्ध हैं तो आप अच्छे वक्ता हो सकते हैं। लेकिन जवाब आप तभी दे सकते हैं, जब आपमें किसी विषय की समझ हो, साथ-साथ न्यूनतम जिम्मेदारी और ईमानदारी भी हो।
मेरे लिए राहुल गाँधी को पप्पू' ना मानने का कारण पिछले तीन साल में दिये गये वो जवाब हैं, जो जिन्होंने ट्रोल और कॉरपोरेट मीडिया के हमलावर पत्रकारों के सवालों पर दिये हैं।
2017 के गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गाँधी ने एक सवाल के जवाब में कहा था `भारत जैसे जटिल देश को चलाना एक तरह का कंप्रोमाइज़ है। जो व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा समूहों से बातचीत करेगा और उन्हें ठीक से सुने और समझेगा, वही इस काम में कामयाब हो सकता है।'
मेरा ख्याल है, इससे न्यायसंगत कोई बात नहीं हो सकती है। मैंने एक पोस्ट में लिखा था कि नरेंद्र मोदी एक ऐसे दौर के नेता हैं, जहाँ उपभोक्तावाद अपने चरम पर है।
वोटर राजनेता को एक सिर्फ प्रोडक्ट के रूप में देखता है। वह मानता है कि मैंने वोट दे दिया तो मेरी जिम्मेदारी खत्म हो गई। प्रोडक्ट आ गया है और वह अपने आप चलता रहेगा।
लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता है। आपको हमेशा उस आदमी पर नज़र रखनी पड़ती है, जिसे आपने चुना है। लेकिन कंज्यूमर वोटर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ चुका है।
जब उसके द्वारा चुने गये नेता की आलोचना होती है, वह उसी तरह रियेक्ट करता है, जैसे कोई कहे कि मैंने 18 लाख की गाड़ी खरीदी है, तुम इसे खराब कैसे बता सकते हो?
सरकार को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर जब वोटर उसकी नाकामियों पर पर्दा डालने लगे तो यह मान लेना चाहिए कि लोकतंत्र गहरे संकट में है।
नरेंद्र इस तेवर के साथ सत्ता में आये थे कि इस देश का पूरा सिस्टम बकवास है और शीर्ष पर बैठे लोग कामचोर है। वे चुटकियों में सबकुछ बदलकर इस देश को स्वर्ग बना देंगे। मगर इसके उलट व्यवस्था ऐसी है कि रेल मंत्री तक को पता नहीं है कि एक स्टेशन से खुली गाड़ी अगले स्टेशन तक पहुँचेगी या नहीं या फिर बीच में ही गुम हो जाएगी।
मोदीजी ने पिछले छह साल में अपने वोटरों की कंडीशनिंग इस तरह की है कि कुछ भी सोचना पाप है, क्योंकि मोदी है, तो मुमकिन है।
कोराना संकट बता रहा है कि लगातार किये जा रहे हवा-हवाई दावों और देश की वास्तविक स्थिति में कितना बड़ा अंतर है।
अगर हम अपनी आनेवाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं तो यह बहुत ज़रूरी है कि इस देश, समाज और सिस्टम को ठीक से समझें और अपेक्षाएँ उतनी ही रखें, जितनी पूरी हो सकती हैं।
तमाम सूचकांकों में सौंवे पायदान से नीचे का भारत किसी जादू की छड़ी से रातों-रात महाशक्ति नहीं बन सकता है। झूठे सपने दिखाने वालों से कहना जनता का फर्ज है कि भइया थोड़ा ठीक-ठाक लगा लो।
चार दिन में चालीस किलो वजन किसी भी तरह के डाइटिंग प्रोग्राम से कम नहीं हो सकता है। उसी तरह रातो-रात कुछ भी बदल जाने का ख्वाब हवा-हवाई है। हम अपने लिए सिर्फ एक वाजिब रास्ता चुन सकते हैं और यह देख सकते हैं कि चुनी हुई सरकार उसपर चल रही है या नहीं। लोकतंत्र में नागरिक का काम बस इतना ही है।

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