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मीठे पानी का दलदल

आज की ताजा खबर, कल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीमार होने का समाचार पूरी दिल्ली में छाया रहा और आज सुबह उनका कोरोना का टेस्ट हुआ। शाम होते ही रिपोर्ट आई और जैसा कि उम्मीद थी रिपोर्ट 'नेगेटिव'। खैर ये वक्त बीमारी पर सियासत का नहीं है। चर्चा सिर्फ इसलिए कि जिस प्रदेश में डाक्टर रिपोर्ट आने से पहले मौत के घाट सिधार जाता है उस प्रदेश के मुख्यमंत्री की रिपोर्ट एक ही दिन में आ जाती है। क्योंकि आम आदमी के नाम पर ये खास बन चुके हैं।
      खैर, आज आपसे चर्चा करना चाहती हूं उन बातों पर जिन्हें दिल्ली सरकार हम दिल्ली वालों से लगातार छुपा रही है। कोरोनावायरस के आंकड़े लगातार सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे हैं और दिल्ली के मुख्यमंत्री हमारा ध्यान इधर उधर भटकाने में लगे हैं। आज की तारीख तक दिल्ली में फोन 29943 मामले सामने आ चुके हैंऔर दिल्ली सरकार और एलजी फिर से इस नूरा कुश्ती में व्यस्त हो गए हैं दिल्ली में कम्युनिटी स्प्रेड हो रहा है कि नहीं हो रहा है। अभी थोड़ी देर पहले दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया प्रेस को बता रहे थे की दिल्ली सरकार का आकलन है कि 12 से 13 दिनों में कोरोना के केस डबल हो रहे हैं और इसे 7 से 15 जून तक 44000 हो जाना चाहिए और 30 जून तक यह संख्या 100000 हो जाएगी 15 जून तक सवा दो लाख और 31 जुलाई तक 5:30 लाख। अपने अभिन्न मित्र मुख्यमंत्री केजरीवाल की तरह मनीष सिसोदिया भी आंकड़ों का खेल खेलने में माहिर हो गए हैं लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने यह नहीं बताया कि इस बढ़ते संकट के लिए सरकार की क्या तैयारी है सिर्फ यह बता रहे थे एलजी ने सरकार का फैसला पलट दिया शो अब जब अस्पतालों के बेड भर जाएंगे तो क्या करना है।
अब, मेरा एक सवाल है। वैसे तो सवाल पूछना लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा का सूचक है लेकिन पिछले कुछ सालों से सवाल पूछना संगीन अपराध की श्रेणी में आने लगा है। फिर भी मैं पूछना चाहती हूं की दिल्ली की सरकार को दिल्ली वालों ने किस लिए चुना था? ताकि मौका आने पर वह अपनी नाकामियों का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ सके। मोहल्ला क्लीनिक का गुणगान करते केजरीवाल और उस उन के नवरत्न थकते नहीं थे। वर्ल्ड क्लास मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की बातें करते थे वह मोहल्ला क्लीनिक उसके डॉक्टर और इंफ्रास्ट्रक्चर कहां गुम हो गये। दिल्ली चुनाव से पहले केजरीवाल ने सरकारी अस्पतालों में 14000 नए बेड जोड़ने और दिसंबर 2019 तक 400 मोहल्ला क्लीनिक बनवाने की घोषणा की थी। आज स्थिति यह है कि दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिक धूल फांक रहे हैं।
      साथियों,  वर्चुअल का एक नया दौर राजनीति में चल पड़ा है केजरीवाल जी ने भी मोबाइल एप लांच किया था ‘दिल्ली कोरोना'. बड़े धूमधाम से मीडिया के सामने ताल ठोक कर बोले थे इस ऐप पर दिल्ली वालों को कोरोना अस्पतालों और खाली बेड की लगातार जानकारी मिलेगी पर हकीकत में ना बेड मिलता है ना सही जानकारी। हमें रोज पता चलता है मरीज अस्पतालों के धक्के खाते खाते भगवान को प्यारे हो जाते हैं पर वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर की दुहाई देने वाली दिल्ली सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था उन्हें इलाज नहीं दे पाती। रोजाना ऐसे उदाहरण अखबारों की सुर्खियां बन रहे हैं सोशल मीडिया पर छाए रहे। इससे पहले भी अपनी नाक बचाने के लिए केजरीवाल ने ना सिर्फ हेल्थ प्रोटोकॉल में छेड़छाड़ की बल्कि ऐसे हालात भी उत्पन्न कर दिए ताकि कम से कम टेस्ट हो और इनकी नाक बची रहे। आज स्थिति यह है की आधे से ज्यादा पूर्णा मरीजों के संक्रमण का सोर्स ही पता नहीं चल रहा ऊपर से दिल्ली सरकार अभी भी अपनी नाक बचाने में लगी हुई है। दिल्ली में इतने सारे प्राइवेट अस्पताल हैं की दिल्ली में कोरोना के मरीजों का बहुत आराम से इलाज किया जा सकता है लेकिन जिन लोगों से दिल्ली सरकार के व्यक्तिगत हित जुड़े हुए हैं उन्हें दबाव में लेने की क्षमता इनके अंदर कहीं से भी नहीं दिखती।          दिल्ली सरकार के शातिराना अंदाज की बानगी कुछ यों है की 27 मई से लेकर 7 जून तक दिल्ली सरकार के हेल्थ बुलेटिन में 509 मौतें बताई थी जबकि दिल्ली के 5 शवदाह गृह जिनमें निगम बोध घाट, पंजाबी बाग, पीके रोड, कड़कड़डूमा और लोधी रोड शामिल है; में इस अवधि में 1019 कोराना मरीजों का दाह संस्कार किया गया। यह आधिकारिक आंकड़े हैं इसकी कोई भी जांच कर सकता है। अब आप समझ गए होंगे की केजरीवाल सरकार किस तरीके का खेल खेल रही है दिल्ली के साथ। 
   दरअसल केजरीवाल दक्षिणी राज्यों की तर्ज पर दिल्ली को हांकना चाहते है। स्वर्गीय शीला दीक्षित की कांग्रेस सरकार ने बड़े जतन से इस दिल्ली को सजाया और संवारा था। यहां के लोगों को विश्वस्तरीय जीवनशैली और इंफ्रास्ट्रक्चर देने की कोशिश की थी लेकिन एक लालची इंसान के लालच में सब बर्बाद करके रख दिया। पिछले 7 सालों में दिल्ली के स्वास्थ्य व्यवस्था में कुछ नया नहीं जुड़ा बल्कि नया जोड़ने के नाम पर हजारों करोड़ों रुपए डकार लिए गए अब जबकि सारी नाकामियों की पोल एक-एक कर खुल रही है तब इनके पास कहने को कुछ रह नहीं गया है। टेस्टिंग की गाइडलाइन मैं परिवर्तन करने की नाकाम कोशिशों के बाद केजरीवाल ने दिल्ली के अस्पतालों को रिजर्व करने का पासा फेंका था जो उल्टा पड़ गया। पिछले संबोधन में मैंने आप लोगों से जिक्र किया था की पिछले कुछ सालों से अवसरवादी राजनीति की पराकाष्ठा को इस महामारी ने नंगा कर दिया है। हरियाणा के रास्ते वाया उत्तर प्रदेश दिल्ली पधारने वाले और अन्ना की टोपी में सिर घुसा कर क्रांति का मानस पुत्र बनने वाले आत्ममुग्ध बेशर्म अरविंद केजरीवाल ने पूरी दिल्ली को राम भरोसे छोड़ दिया है। ऐसे लोग अपनी अधिकार हीन सियासी दुकान चलाने के लिए प्रदेशों में पृथकतावादी सोच का बीज बोते रहते हैं ताकि वह चर्चा में बने रहें। दिल्ली की बगिया को हमारी प्यारी शीला दीक्षित जी ने बड़े अरमानों से सजाया था और हम इसे इतनी जल्दी और इतनी आसानी से किसी अनाड़ी के हाथों उजड़ने नहीं देंगे। हमारे नेता अजय माकन जी मानवाधिकार आयोग में जा रहे हैं ताकि दिल्ली के सभी अस्पतालों के 70% बेड कोरोनावायरस के लिए आरक्षित किए जा सकें और उनका जल्दी से जल्दी इलाज हो। कांग्रेस के सिपाही दिल्ली भर में और दिल्ली से बाहर भी गरीब और प्रवासी कामगारों के राशन और भोजन की व्यवस्था में लगातार जुटे रहे हैं। आज भी हम हर जगह सैनिटाइजेशन कर बीमारी को दूर भगाने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। हमारे आदर्श पंडित नेहरू ने कहा था सेवा के लिए भावना की जरूरत है अधिकार की नहीं। सो यह भावना हमारे अंदर कूट-कूट कर भरी है। वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे इस भावना के साथ अपना दिन प्रारंभ करने वाली कांग्रेस पार्टी और उसके कार्यकर्ता देशभर में इस महामारी से निबटने के लिए हर संभव प्रयत्न कर रहे हैं। हम सरकार के साथ हैं तब तक जब तक की वह जनता के साथ है। सरकार का ध्यान जनहित से हटते ही हमें उनको उनका कर्तव्य याद दिलाना पड़ेगा क्योंकि दिल्ली हमने बनाई थी और इसे वैसा बनाए रखना हमारी सर्वोपरि जिम्मेदारी है।

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