'मैया मोरी, मैं नही माखन खायो' वाला तरीका जैसा ही कुछ जो मेरी समझ में आता है वैसे ही किसी ने पेगासस को तैनात नहीं किया। जैसे 2020 में जेएनयू के छात्रों पर हुए हमले, या 2021 में चिकित्सा सहायता के अभाव में हजारों लोगों की मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है। क्योंकि वास्तव में, किसी डिजिटल फोरेंसिक विश्लेषण के बिना यह जानना संभव ही नहीं है कि क्या वे सभी फोन पेगासस स्पाइवेयर द्वारा टारगेट किये गये थे।
जबकि केंद्र सरकार की ओर से इस बात से कोई स्पष्ट इनकार नहीं किया गया है कि पेगासस स्पाइवेयर द्वारा 300 से अधिक भारतीय मोबाइल टेलीफोन नंबरों को निशाना बनाया गया था, अभी 18 और 19 जुलाई के साथ-साथ 2019 की सरकारी प्रतिक्रियाएँ अवैध कृत्य के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराती हैं। फिर भी, सत्य यह है कि आतंकवादियों और अपराधियों पर नज़र रखने के लिए पेगासस स्पाइवेयर, जिसे केवल इजरायली फर्म एनएसओ समूह द्वारा "सत्यापित सरकारों" को बेचा जाता है, का उपयोग पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, व्यावसायिक अधिकारियों और राजनेताओं, जिनमें और कम से कम एक "संवैधानिक प्राधिकारी" है, के स्मार्टफोन को हैक करने में किया गया था। , हमें चिंतित होना चाहिए, चाहे हम आश्चर्यचकित हों या नहीं। सीधे सीधे बोलें तो सरकार अपने ही नागरिकों की जासूसी कर रही है, जिनमें कई लोग अपने काम-धंधे पर जा रहे हैं, या अपने निजी पलों में हैं या अपने परिवार के बीच हैं।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को हैक करना एक अपराध है। हैकिंग सरकार द्वारा निर्देशित होने पर भी कोई अपवाद नहीं है। भारत में, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 43 के तहत डिवाइस को हैक करना एक आपराधिक अपराध है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन, 19 जुलाई को एक ब्लॉग में, टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत उपलब्ध पूर्व-मौजूदा निगरानी शक्तियों की ओर इशारा करता है, जो स्पाइवेयर या हैकिंग मोबाइल उपकरणों की स्थापना की अनुमति नहीं देता है। जबकि टारगेट के फोन में दूरस्थ रूप से हैकिंग के बिना पेगासस स्पाइवेयर को तैनात नहीं किया जा सकता है। “NSO और पेगासस जो करते हैं वह निश्चित रूप से अवैध हैकिंग का एक उदाहरण है। उस प्रावधान में सरकार के लिए कोई अपवाद नहीं है। इसलिए यह मामला बहुत गंभीर है और सरकार की प्रतिक्रिया कि "सरकारी एजेंसियों द्वारा कोई अनधिकृत अवरोधन" नहीं है, कहीं नहीं टिकता है। मामले की सच्चाई का पता विस्तृत, निष्पक्ष और उच्च स्तरीय साइबर जांच के बाद ही चलेगा, अगर कभी ऐसा होता है। इस प्रकार, कुछ समय के लिए, हम केवल प्रौद्योगिकी के इस तरह के दुरुपयोग के प्रभावों के बारे में चिंता कर सकते हैं।
पेगासस प्रोजेक्ट द्वारा दावा किए जा रहे ऐसे पैमाने की निगरानी का साफ साफ मतलब है कि देश में नागरिकों की गोपनीयता, ऑनलाईन डाटा और ऑनलाइन सुरक्षा सबकुछ दांव पर है। हालांकि सरकारों ने पहले भी राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में या आतंकवादी लक्ष्यों पर नजर रखने के लिए जासूसी तकनीकों का उपयोग किया है पर इस प्रकार सार्वजनिक रूप से जायज मांग करने वालों या विरोध में मानवाधिकारों के लिए बोलने वाली आवाजों की एक निगरानी सूची संभावित रूप से किसी भी प्रकार की असहमति को दबा सकती है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गोपनीयता के अधिकार को खतरे में डाल सकती है।
भले ही सरकार ने, काफी अपेक्षित रूप से, किसी भी 'अनधिकृत निगरानी' से इनकार किया है। यह सच हो सकता है, लेकिन मुद्दे की बात यही है कि ऐसी बात उठी कैसे। इस तरह की साइबर निगरानी या 'ऑफ-द-एयर' कॉल इंटरसेप्शन कानून और नियमों के तहत संचार के अवरोधन के प्रोटोकॉल के दायरे में नहीं आता है। लेकिन साहब यह मोदी सरकार है जिसका नजरिया अलग है और इसके जवाब अलग। 20 महीने से क्या फर्क आया? ज्यादा नहीं, जब पेगासस स्पाइवेयर और इसके उपयोग पर सरकार के रुख की व्याख्या करने की बात आती है। लोकसभा में सोमवार को, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी के नए मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 28 नवंबर, 2019 को अपने पूर्ववर्ती रविशंकर प्रसाद द्वारा कही गई बातों को प्रभावी ढंग से दुबारा कह दिया । तब के मंत्री रविशंकर प्रसाद राज्यसभा में जवाब दे रहे थे जब एक अंग्रेजी अखबार ने इसी मसले पर व्हाट्सएप खुलासे पर एक रिपोर्ट छापी थी जिसमें यह स्पष्ट कहा गया था कि पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की निगरानी पेगासस का उपयोग करने वाले ऑपरेटरों द्वारा की जा रही है।
लेकिन तब और अब दोनों बार, दोनों माननीय मंत्रियों, श्री प्रसाद और श्री वैष्णव विपक्षी सदस्यों द्वारा उठाए गए इस महत्वपूर्ण प्रश्न को टाल दिया कि क्या सरकार या उसकी एजेंसियों को पेगासस मिला और, यदि हां, तो इसके उपयोग की शर्तें क्या थीं? इसके बजाय, दोनों ने इस दावे को दोहराने के लिए कानून की धाराओं का हवाला दिया कि सभी इलेक्ट्रॉनिक अवरोधन उचित प्रक्रिया का पालन करते हैं।
अब इस खुलासे के बाद जारी किए गए हाई-प्रोफाइल नामों और सरकार द्वारा उठाए गए सवालों को पूरी तरह से खारिज करने को देखते हुए, यह स्पष्ट हो गया है कि मौजूदा सरकार की मंशा क्या है। इसलिए 2019 की बहस और अब का खुलासा दोनों इस बात का पूर्वाभास है कि आगे क्या हो सकता है। वास्तव में, निगरानी का भविष्य - असंतुष्टों और कार्यकर्ताओं पर उतना ही केंद्रित किया जा रहा है जितना कि आतंकवादी और अपराधी तत्वों पर- और यह सत्ता तंत्र द्वारा निर्धारित किया जाएगा। इनके फैसले मुल्क भर में लोकतंत्र के भविष्य का निर्धारण करेंगे। जैसा कि एनएसओ कहती है कि उसके ग्राहक सभी संप्रभु सरकारें हैं लेकिन वे जो नहीं कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ये सरकारें ज्यादातर सऊदी अरब जैसी निरंकुश या हंगरी और भारत जैसी आत्मकेंद्रित हैं। यद्यपि एनएसओ एक निजी कंपनी है, पर इजरायल सरकार, निर्यात लाइसेंस के माध्यम से, नियंत्रित करती है कि कंपनी को अपने उत्पादों को भेजने की अनुमति कहाँ-कहाँ है। और ये कंपनियां लोकतंत्र के शुद्ध और आदर्शवादी प्रेम के कारण ऐसे प्रयास नहीं करती हैं। वे ऐसा इसलिए करती हैं क्योंकि गोपनीयता के मामले में अमेरिकी मानदंडों का पालन करना उनके उत्पादों का विपणन और बिक्री के लिए अति आवश्यक है। अक्टूबर 2019 में, व्हाट्सएप ने पेगासस नामक एक सॉफ्टवेयर विकसित करने के लिए एनएसओ पर मुकदमा दायर किया। तब व्हाट्सएप ने खुलासा किया था कि एनएसओ के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल उनकी जीरो-डे भेद्यता की तकनीक का फायदा उठाकर 1,400 से अधिक फोन पर मैलवेयर भेजने के लिए किया गया था। उनका कहना था कि बस एक लक्षित डिवाइस पर व्हाट्सएप कॉल करने से, फोन पर दुर्भावनापूर्ण पेगासस कोड स्थापित किया जा सकता है, भले ही उस डिवाईस ने कभी भी कॉल का जवाब न दिया हो। यह भी कहा गया कि NSO ने Apple के iMessage सॉफ़्टवेयर में कमजोरियों का फायदा उठाना शुरू कर दिया है, जिससे उसे करोड़ों iPhones तक पिछले दरवाजे से पहुँच मिल गई है। Apple का कहना है कि वह इस तरह के हमलों को रोकने के लिए अपने सॉफ़्टवेयर को लगातार अपडेट कर रहा है। व्हाट्सएप के अनुसार, सॉफ्टवेयर ने 1,400 मानवाधिकार गतिविधियों, पत्रकारों और वकीलों के मोबाइल को हैक करने के लिए प्लेटफॉर्म में कमजोरियों का फायदा उठाया - जिसमें 121 भारतीय भी शामिल हैं। इस मामले में फैसला आना अभी बाकी है जिसपर भविष्य का रूख निर्भर करेगा।
लेकिन इस खुलासे के बाद अब हम जानते हैं कि सुरक्षा के विफल होने पर कौन-कौन असुरक्षित है पर इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में कौन-कौन असुरक्षित नहीं होगा। अभी फिलहाल में, कथित तौर पर इस सूची में विपक्ष के नेता, दलित सशक्तिकरण के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता, चुनाव आयोग के एक स्वतंत्र सदस्य एक प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट भी शामिल हैं। समस्या वहां नहीं है एक आम परिवार जिसने एक ताकतवर सत्ता के करीबी व्यक्ति पर यौन-शोषण का आरोप लगाया उसका नाम भी आना यह इंगित करता है कि अगर आप मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के रहमो-करम पर हैं वरना आपकी निजता खतरे में है।
एक और सवाल रखने के पूर्व मैं यह बता दूं इस सिस्टम के एक लाइसेंस की कीमत 7-8 मिलियन डॉलर है और एक लाइसेंस 50 फोन पर इस्तेमाल हो सकता है. ये कॉल, मैसेज, माइक्रोफोन, कैमरा रिमोट एक्टिवेशन जैसा सभी डेटा देता है. अब सवाल यह है कि क्या वो सरकारी स्टाफ है, या ये सब आउटसोर्स कराया गया है? अगर आउटसोर्स है तो इसका सेफगार्ड क्या है? स्थिति और भी खराब इसलिए है क्योंकि गारंटी नहीं है कि डेटा सरकार के पास ही रहे. क्या होगा अगर इसे निजी बिजनेस हितों के लिए बेचा गया हो या जजों, मंत्रियों और अधिकारियों से लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल किया गया हो? या फिर विदेशी हाथों में बेचा गया हो? वो लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर जानकारी छुपाने की कोशिश करेंगे लेकिन राजनीतिक नियंत्रण के लिए उनका गैरकानूनी सर्विलांस असल में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है अगर ये गैरकानूनी सरकारी सर्विलांस है तो।
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