अपनी भाषा के ज्ञान के बिना व्यक्ति का विकास संभव नहीं है फिर वह राष्ट्रभाषा या मातृभाषा। भाषा का ज्ञान मनुष्य के व्यक्तित्व विकास का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होता है। यही माध्यम उसे जमीन से जोड़ता है और विकास की ओर बढ़ता है। लेकिन वर्तमान समय में ज्ञान अंग्रेजी भाषा के एकाधिकार में चला गया है और बच्चों के ज्ञानार्जन का प्रवाह कठिन से सहज की ओर बहना आरंभ हो गया है। जबकि ज्ञान की परंपरा सहज से कठिन की ओर बढ़ाती है जो बच्चे के बौद्धिक विकास में सहायक होता है। अपनी मातृभाषा में शिक्षा का अभाव बच्चों की सीखने की क्षमता को न केवल प्रभावित करता है बल्कि उन्हें हीनता बोध से भी ग्रसित बनाता है और मेरा आज के परिपेक्ष में अंग्रेजी विज्ञान और तकनीक की भाषा है और इस कारण समाज का एक बड़ा वर्ग इस से दूर हो गया है।
मातृभाषा सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि वह माध्यम है जो अबोध बालक बालिकाओं को उनकी सांस्कृतिक विरासत से सिंचित करता है क्योंकि भाषा अपने साहित्य से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई होती है। प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वह है सीखना और अवधारणात्मक क्षमता को विकसित करना। मातृभाषा का ठोस आधार जिन बच्चों को प्राप्त होता है उनकी अवधारणात्मक क्षमता और चिंतन की पद्धति अधिक पुष्ट और विकसित देखी जाती है। मातृभाषा में अध्ययन से बच्चे तेजी से सीखते हैं क्योंकि सोच-विचार, चिंतन की स्वाभाविक प्रक्रिया मातृभाषा के द्वारा ही संभव हो पाती है।
एक और हिंदी विश्व बाजार की भाषा बन रही है, वैश्विक फलक पर इसे पढ़ाया जाने लगा है वही देश के भीतर स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ना एक चिंता का विषय है। हिंदी का एक विशाल बाजार भी बना है. अखबार, पत्रिकाएं, शैक्षणिक साहित्यिक किताबें, साहित्य, सिनेमा, टीवी और ऑनलाइन- हिंदी सर्वत्र उपस्थित है. जनसंचार माध्यमों की वो एक प्रमुख भाषा है, कमोबेश सभी उद्योगों और व्यापारिक गतिविधियों में हिंदी का बोलबाला है.आज हिंदी लोकल से ग्लोबल हो गई है पर स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी का वर्चस्व पड़ रहा है। इसका एक पक्ष यह भी बताया जाता है की अधिकांश लोग तब विवश दिखाई देते हैं जब उन्हें रोजगार संबंधी आवश्यकताओं और जीवन व्यवहार के लिए किसी विशेष विदेशी भाषा को अपनी मातृभाषा के ऊपर वरीयता देनी पड़ती है। जब हम भारतीय संस्कृति और दर्शन के संबंध में शिक्षा पर दृष्टिपात करते हैं तो यहां शिक्षा जीविकोपार्जन का साधन मात्र बनकर नहीं रह जाती बल्कि भारतीय परंपरा में यह वस्तुत: हमारे जीवन की समग्रता की ओर संकेत करती है जिसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों का समावेश है।
दूसरे दृष्टिकोण से इसका एक अन्य कारण भाषाई संघर्ष भी है जिस चक्कर में कुछ भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं, कुछ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं तो कुछ संघर्ष कर रही हैं बोली से भाषा बनने का। कुछ का संघर्ष पहचान का है तो कुछ का वर्चस्व का। संघर्ष बोलियों में भी है और भाषाओं में जिसके नतीजे ने आजादी के इतने सालों बाद भी हिंदी को ना पूरी तरह राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया ना पूरी तरह राजभाषा का। हमारा बहुभाषिक होना एक और हमें शब्द संपदा से समृद्ध करता है तो दूसरी ओर हिंदी और हिंदीतर भाषी के मध्य मतभेद भी उत्पन्न करता है और शायद यही कारण है कि दक्षिण भारत में मातृभाषाओं के बाद सबसे ज्यादा प्रयोग की जाने वाली भाषा अंग्रेजी है।
संसार के मानचित्र पर हमारी अभी दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि अमूमन सभी ऐसे देश जिनकी अपनी भाषाएं विकसित ना हो सकी वह वैश्विक मानचित्र पर पिछड़े हुए हैं। अफ्रीकी महाद्वीप में 40 से भी ज्यादा देशों में उनकी अपनी किसी स्वतंत्र भाषा का विकास नहीं हो सका और हैरत नहीं होनी चाहिए कि अफ्रीकी देश विकास में बहुत पिछड़े हैं वहीं चीन और इजराइल जैसे देशों का उदाहरण भी हमारे सामने। जर्मनी और जापान अनुसंधान के क्षेत्र में सबसे आगे हैं और अलग-अलग भाषाओं के शोध पत्र उनके यहां उनकी भाषा में अनूदित करवा कर वहां विद्वानों के पढ़ने के लिए मुहैया करा दिए जाते हैं।
यह अटल सत्य है की दक्षिण पूर्व एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के इलाकों में अंग्रेजी न जानने के कारण बहुत सारी युवा प्रतिभाएं अवसरों से वंचित रह जाती हैं। भारतीय भाषाओं की इस स्थिति का बहुत बड़ा कारण हमारी व्यवस्था है जो पूरी तरह अंग्रेजी भाषा पर निर्भर है। भारत की 22 भाषाओं में से कुछ को भाषा और कुछ को कार्य भाषा का दर्जा प्राप्त है इसके बावजूद देशभर में अधिकांश प्रशासनिक कार्य अंग्रेजी में होते हैं और मेरा देश के भीतर भाषा के स्तर पर हिंसा बोध का ही प्रभाव है कि आज शिक्षा विज्ञान तकनीक और रोजगार की भाषा अंग्रेजी बन गई पर याद रहे आज जितने भी देश विश्व में उन्नत हुए हैं पर अपनी मातृभाषा में पढ़कर ही हुए हैं। मातृभाषा राष्ट्र के संकेत संस्कृति दर्शन इतिहास और धर्म का वाहक क्यों होती है जिससे जब एक शिशु संचित होता है तो उसमें राष्ट्र का गौरव स्वाभिमान और आत्मसम्मान जैसी भावनाएं स्वत: विकसित हो जाती हैं।
देश की सर्वोच्च सेवा का अवसर प्रदान करने वाली संस्था संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा भी अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ने में नाकाम रही है क्योंकि यहां हर साल परीक्षा में चयनित विद्यार्थियों में अधिकतर का परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी होता है। कुछ गिने-चुने ही अभ्यर्थी होते हैं जो अपनी मातृभाषा और हिंदी भाषा के जरिए इस पद तक पहुंच पाते हैं। आज स्थिति यह है कि विद्यार्थी हिंदी पर गर्व तो करते हैं किंतु उसे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा का माध्यम बनाने से डरते हैं और इस बार का कारण अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व है जिसने हिंदी के साथ साथ अन्य भारतीय भाषाओं को भी पंगु बना दिया है। भारत की 44% और विश्व की 18% जनसंख्या द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी की यह दशा सच में सोचनीय है। प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से बनता है कि आखिर राजभाषा हो जाने के बाद भी हिंदी को कौन सा मुकाम और कौन सा हक मिलना बाकी रह गया है परंतु बतौर राजभाषा हिंदी को हासिल हुई मान्यता को याद करने और सम्मान जताने के लिए हिंदी दिवस मनाया जाता है. लेकिन तमाम आयोजनों के बीच आज मुख्य चिंता यही है कि हिंदी सत्ता और वर्चस्व की भाषा बन कर न रह जाए.
हिन्दी सिर्फ़ भाषा नही. हमारे आत्मगौरव और आत्म सम्मान का मुद्दा है. हमारी अस्मिता का सवाल है. जो पूरे देश को एकता के सूत्र में बाँधती है. 14 सितंबर को हर साल हम ‘हिंदी दिवस’ मनाते है.आखिर यह हिंदी दिवस मनाने की जरूरत क्यों है ? दिवस तो उसके होते हैं, जो साल में एक बार आता हो. पर हिंदी तो सतत प्रवाहिनी है. दिन-रात, सुबह-शाम हमारे होंठों पर होती है. जिनके होंठों पर नहीं होती, उनकी चेतना में होती है, उनके स्वप्न में होती है, छायाओं में होती है.
हिंदी, जो हमारी अस्मिता का बोध है, जो हमारी मातृभाषा है, जो हमारी सोच की रगों में लहू बनकर बहती है, जो हमारी आजीविका का साधन है, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है. आखिर उसका दिवस मनाने का यह चोंचला क्यों? इस देश में हमें हिंदी ही मिली थी सरकारी औपचारिकताओं के हथौड़े से कूटने के लिए! हिंदी तो इस देश की आत्मा है, फिर उसे सरकारी फाइलों से क्यों जूझना पड़ रहा है?
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