समन्वय और समरसता की मिसाल रहे भारत के 13वें राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी अपने जीवन के 84 वर्ष पूरे कर 31 अगस्त को अनन्त की यात्रा पर निकल गए और इसके साथ ही भारतीय राजनीति के एक युग का अंत हो गया। विगत कुछ दिनों से वह जिस जीवटता के साथ बीमारियों से लड रहे थे वह उनके व्यक्तित्व का ही एक हिस्सा था। भारतीय राजनीति में छह दशकों का लंबा सफर तय करने वाले प्रणव मुखर्जी देश की चुनिंदा कददावर हस्तियों में से एक थे। विलक्षण व्यक्तित्व तीक्ष्ण बुद्धि तथा बेजोड याददाश्त के स्वामी स्व0 प्रणव दा इतनी सटीक जानकारी तथा इतने सटीक फैसले लिया करते थे कि भारतीय राजनीति में उनके जैसा राजनेता दुर्लभ है। उनके विरल व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं! इतने कोण हैं! कि उन्हें एक छवि में बांधना असंभव सा है। जिस पर भी कौतूहल यह है कि जो सबसे बडे आयाम हैं वे तो इन सब परिभाषाओं से बाहर ही छूट गए हैं। और वे हैं ‘भारतीय लोकतंत्र के लाडले नायक’! राष्ट्रीयता का पोषक! विविधता में एकता का प्रेरक! विरोधी विचारों में समन्वय सेतु!
उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के इतने लंबे दौर में लगभर हर मंत्रालय की जिम्मेदारी को अनूठे ढंग से संभाली। न केवल भारत में बल्कि दुनियां में अपने राजनीतिक कौशल एवं विलक्षण प्रबंधन क्षमता से अपनी स्वतंत्र पहचान कायम की। विशेषत: विश्वस्तर पर उन्हें सबसे ज्यादा पहचान भारत के वित्तमंत्री के रूप में मिली। खासतौर पर 2008 की भयावह मंदी से उबारने के काम के क्रियान्वयन के लिए प्रणव मुखर्जी का नाम विश्व भर में लिया जाता है। न्यूयार्क की पत्रिका ‘यूरोमनी’ के अनुसार 1984 में दुनियां के पांच सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्रियों में एक प्रणव मुखर्जी भी शामिल थे। सातवें और आठवें दशक में उन्होंने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा भारतीय आयात-निर्यात बैंक के साथ ही राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना में महती भूमिका निभाई। स्व० प्रणव मुखर्जी ने 1991 में केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे का जो फार्मूला तैयार किया उसे आज भी ‘गाडगिल-मुखर्जी फार्मूला’ ही कहा जाता है। भारत के आर्थिक मामलों संसदीय कार्य बुनियादी सुविधाएं व सुरक्षा समिति में वे सबसे वरिष्ठ नेता बने रहे। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन व भारतीय विशिष्ट सेवा प्राधिकरण क्षेत्र में भी कार्य किया था जिसका अनुभव उन्हें अपने राजनीतिक सफर में बहुत काम आया। कई बार चर्चा हुई कि वे प्रधानमंत्री बनने लायक थे और उनको बनाया नहीं गया लेकिन उनकी अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि कांग्रेस पार्टी द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाये जाने के पहले यूपीए सरकार के आठ वर्षो में वे विभिन्न विभागों से संबंधित करीब 200 मंत्रियों के समूह(जी ओ एम) की अगुवाई कर रहे थे। इन समूहों में प्रशासनिक सुधार सूचना का अधिकार रोजगार का अधिकार खादय सुरक्षा उर्जा सुरक्षा सूचना प्रौघोगिकी और दूरसंचार भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण मेट्रो रेल आदि की स्थापना से संबंधित मंत्री समूह थे। अनुभवों का अनंत भंडार रखने व चंडीपाठ से लेकर रात के डायरी लिखने तक की उनकी दिनचर्या जीवनपर्यंत अनवरत और निर्बाध बनी रहीं। इस उम्र में भी सुबह की सैर उनके दिन की शुरूआत का अभिन्न अंग थी जो उनके अस्पताल में भर्ती होने तक निर्बाध जारी रही।
उनकी खासियत बिना किसी दिखावे के ठोस नतीजे देने की रही क्योकि उनके पास अनुभव और ज्ञान का अकूत भंडार था। समकालीन भारतीय राजनीतिक इतिहास में प्रणव दा का उल्लेख एक जननेता नहीं बल्कि एक रणनीतिकार के रूप में किया जाएगा।अपनी संसदीय कुशाग्रता और राजनीतिक कौशल के बूते वह राजधानी नई दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक पहुंचे और वहां से सत्ता के शीर्ष रायसीना हिल्स स्थित ‘राष्ट्रपति भवन’ तक। राष्ट्रपति पद के साथ औपचारिक तौर पर लगाये जाने वाले संबोधन ‘महामहिम’ के उदबोधन को उन्होंने खत्म करके एक मिसाल कायम की। भारत के राष्ट्रपति के रूप में प्रणव दा का कार्यकाल ऐतिहासिक गैरविवादास्पद और सरकार से बगैर किसी टकराव के रहा। उनकी एक और खासियत इस दौर की रही कि वह दया याचिकाओं पर फैसला लेने में तनिक भी देर नहीं करते थे। भारत की सरकार में अपनी भागीदारी के दौरान संकटमोचक माने जाने वाले प्रणव दा का राष्ट्रपति का कार्यकाल बगैर किसी राजनीतिक जुडाव के बीता। भारत सरकार के मंत्रीपद पर आसीन रहते हुए उन्होंने बातचीत के द्वारा विभिन्न समस्याओं का समाधान निकाला परंतु एक भी ऐसी घटना अभी तक प्रकाश में नहीं आई जब उन्होंने शालीनता की मर्यादा पार की हो! कोई ओछी टिप्पणी की हो जबकि आजकल सार्वजनिक जीवन में लोग पदासीन होने से पहले ही मर्यादा पार करने को अपनी शान मानते हैं। सार्वजनिक मंचों से ओछी टिप्पणियां करते उनकी जबान नहीं लजाती।स्व० प्रणव दा की कानून; सरकारी कामकाज की प्रक्रियाओं की बेहतरीन समझ और संविधान की बारीकियों की जानकारी उनकी कार्यशैली को हमेशा से अकाट्य बनाती रही। विचारधाराओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और उसके इतर उनकी स्वीकार्यता दो ऐसे विपरीत गुण उनकी चारित्रिक विशेषताओं में हमेशा समाहित रहे। यहां तक कि संघ मुख्यालय में दिए अपने संबोधन में भी उन्होंने भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति की शिक्षा वहां उपस्थित संघ के सभी ओहदेदारों को प्रदान की और उसे अपनाने पर ही जोर दिया।
संसदीय राजनीति और संवैधानिक मूल्यों की इतनी गहरी समझ रखने वाला राजनेता विरले ही कभी कभी इस दुनियां में दिखते हैं। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं और अपनी कार्यशैली से हरएक को प्रभावित किया। उनके लिए राजनीति का मतलब मूल्यों से था। वे उन चुनिंदा राजनेताओं में से थे जो राजनीति के मूल्यों के प्रति सदा सर्वदा सचेत रहते हैं और नाना धर्मों में आस्था रखने वाले तथा दूसरे धर्मो के प्रति सहिष्णुता रखनेवाले धर्मनिरपेक्ष लोगों के प्रति सदैव तनकर खडे रहते हैं। कांग्रेस पार्टी की इसी खांटी विचारधारा के पैरोकार बनकर स्व० प्रणव दा अपने जीवन के आखिरी क्षण तक उसी सोच के साथ चिपटे रहे जैसे कि शिशु अपनी मां से चिपटा रहता है। उनकी राजनीति इसलिए भी मूल्यवान बन सकी थी क्योंकि उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए कभी सिद्धांतविहीन समझौते नहीं किए।
वास्तव में इतिहास उनका मूल्यांकन एक ऐसे राजनेता के रूप में करेगा जिनका जीवन पूरी तरह से समरसता और भारतीयता से ओतप्रोत था। उनके जीवन के इन्हीं मूल्यों को संचित एवं समाहित रखना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांचलि होगी।

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