आज काफी समय बाद थोडा चैन से बैठी हूँ . एक पुराना अखबार हाथ लगा और उसमे एक खबर थी मॉडल विवेका बालाजी की आत्महत्या की. खबर पढ़ते ही मुझे याद आ गई मधुर भंडारकर की रियल टाइम मूवी फैशन की और याद आया एक किरदार कंगना रानावत ने निभाया था. मॉडलिंग की दुनिया का वह नंगा सच जो मधुर ने दिखने की कोशिश की थी एक बार फिर नग्नता की पराकाष्ठा के साथ हमारी नजरों के सामने था. विवेका बाबजी की आत्महत्या के कारणों की बात जब भी उठती है, गौतम वोरा का नाम जरूर आता है। प्राय: सभी का मानना है कि अगर गौतम ने उसके साथ बेवफाई न की होती, तो वह आज जीवित ही नहीं, स्वस्थ-प्रसन्न होती। विवेका ने आत्महत्या की रात अपनी डायरी में लिखा था, यू किल्ड मी, गौतम। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कराह लगती है जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा हो। इसीलिए सबकी सहानुभूति विवेका के साथ है। गौतम वोरा सबकी निगाह में खलनायक हो गया है। एक पत्रकार ने तो यहां तक लिख डाला कि विवेका की जान इसलिए गई कि उसने गलत आदमी का चुनाव किया था। गौतम वोरा के अलावा कोई और नहीं जानता न जान सकता है कि विवेका के साथ उसका रिश्ता क्या था? शायद विवेका भी नहीं जानती थी। अगर जानती होती, तो वह इतने विषाद में न पड़ती कि मृत्यु के चयन के अलावा उसे कोई और रास्ता न दिखाई पड़े। वैसे प्रेम में निराशा या बेवफाई का सदमा जरूरी नहीं कि आदमी को खुदकुशी की ओर ले जाए। आत्महत्या के मनोविज्ञान का अध्ययन करने वालों का कहना है कि कोई भी घटना सभी व्यक्तियों को एक ही तरह से प्रभावित नहीं करती। ऐसे भी लोग हैं जो मामूली-सी बात पर आत्महत्या कर लेते हैं। दूसरी तरफ, कुछ व्यक्तित्व इतने मजबूत होते हैं कि बड़ी-बड़ी घटनाओं को अपने ऊपर हावी होने नहीं देते। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि दुनिया की आपकी समझ कैसी है। विवेका के अनेक मित्रों और परिचितों ने उसकी स्थिति और उसके मनोविज्ञान पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। इनसे संकेत मिलता है कि उसका दुख किसी एक तरह का नहीं था। हो सकता है, बेवफाई के एहसास ने विवेका को उस बिंदु पर पहुंचा दिया हो जहां से लौट कर कोई वापस नहीं आता। गौतम से अपने संबंध को विवेका जिस तरह से समझ रही थी, जरूरी नहीं कि विवेका से अपने संबंध को गौतम भी उसी स्तर पर महसूस कर रहा होगा। कोई और आदमी यह भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि दोनों के बीच जो संबंध था, उसे प्रेम के नाम से परिभाषित करना तर्कसंगत होगा या नहीं। प्रेम भी सबके लिए एक ही अर्थ नहीं रखता। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि धर्म उतने हो सकते हैं जितने लोग धरती पर रहते हैं। कारण, ईश्र्वर से सबका रिश्ता अपना-अपना होता है और नैतिकता की सबकी समझ भी अपनी-अपनी होती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि प्रेम भी उतनी तरह का हो सकता है जितनी तरह के लोग धरती पर रहते हैं। इसलिए कोई दूसरे के प्रेम की तुलना अपने प्रेम से क्यों करे। नि:संदेह बेवफाई बुरी चीज है, लेकिन कोई बेवफाई करता क्यों है? इसे समझे बिना दोष निरूपण का तरीका न्यायसंगत नहीं हो सकता। जीवन के दूसरे संबंधों की तरह, प्रेम को भी हम एक स्थायी बंदोबस्त मानने के आदी हैं। जीवन में और खासकर संबंधों में कुछ भी स्थाई नहीं होता। स्थाई हो ही नहीं सकता, ऐसा नहीं है। ज्यादातर संबंध स्थाई ही होते हैं, खासकर जब वे विवाह में परिणत हो जाते हैं, लेकिन बिना विवाह के भी आखिरी सांस तक प्रेम के अनेक उदाहरण दिखाई पड़ते हैं। जब हम किसी संबंध में उतरते हैं, तो यह मानकर ही उतरते हैं कि यह अनंत भविष्य तक जारी रहेगा। हमारे यहां जनम-जनम के साथ की बात की जाती है, हालांकि अधिकांश युगल दिली तौर पर नहीं चाहते होंगे कि अगले जन्म में भी यही साथ मिले। संबंध अक्सर पुराने जूतों की तरह हो जाता है, जिनमें हमारे पैर आराम महसूस करते हैं। इसके बावजूद, जब जूते फट जाते हैं तो उन्हें बदलना ही पड़ता है। ईश्र्वर का लाख-लाख धन्यवाद कि उसने हमें पिछले जन्मों की स्मृतियों से वंचित कर रखा है। नहीं तो यह दुनिया नरक हो जाती। जब एक शरीर के विनाश के बाद आत्मा नए वस्त्र पहनती है और जीवन की एक नई इकाई के रूप में दुनिया में लौटती है, तो उसे नए संगी-साथी चाहिए होते हैं। इसी तरह, क्या एक ही जन्म में आदमी बार-बार मरता और फिर-फिर नहीं पैदा होता है? तो क्या आदमी को अपनी प्रतिश्रुति से बंधा नहीं होना चाहिए? अगर सभी लोग क्षण में जीना शुरू कर दें और आज के व्यवहार तथा कल के व्यवहार में कोई तारतम्य न रह जाए, तो इससे जो अराजकता पैदा होगी, उसे हममें से कौन सह सकता है? क्षण सत्य है, पर क्षणों का सिलसिला भी कम सत्य नहीं है। इसलिए परिवर्तन और निरंतरता, दोनों के मेल से ही जीवन में खुशबू आती है। जो वादे कानूनी तौर पर किए जाते हैं, उन्हें निभाना किसी भी आदमी का न्यूनतम कर्तव्य है। ऐसे वादों को कानून की शरण में जा कर ही तोड़ा जा सकता है। नहीं तो दुनिया चल नहीं सकती। इसके विपरीत, व्यक्तिगत स्तर पर किए गए वादे को उस क्षण का वादा समझकर चलने में ही भलाई है। जब कोई लड़की किसी लड़के से कहती है-आइ लव यू, तो यह उसकी उस क्षण की भावना है। और, किसी भी भावना को शाश्र्वत मानकर नहीं चला जा सकता। जब कोई जीवन किसी एक क्षण से बंध जाता है, तो वह जंजीर की फंसावट का शिकार हो जाता है। जीवन तभी तक मजेदार है, जब तक वह स्वतंत्र है। यह मान कर चलना ही सत्य के साथ तंदुरुस्त रिश्ता बनाना है।
अक्सर देखा यह गया है कि कुछ लोगों की प्रकृति या कहें प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें अच्छाई में भी खोट नजर आने लगती है। किसी सही बात की तारीफ की उम्मीद तो इनसे करना बेकार है, ये तो उसमें भी मीन-मेख निकालने से नहीं चूकते। शायद ऐसी ही प्रवृत्ति जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव की भी होती जा रही है। आजकल वे बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर देते हैं या कोई मुद्दा उठा देते हैं और बाद में उन्हें मुंह की खानी पड़ती है। अपनी इसी प्रवृति का एक नया नमूना स्वनामधन्य श्री यादव ने कल पेश किया. शरद यादव ने सोमवार को फतुआ में एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए जेडी (यू) नेता और एनडीए संयोजक शरद यादव ने गांधी परिवार पर तीखे हमले किए। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए। उन्होंने कहा, ' मोतीलाल, जवाहरलाल, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी। अब एक नया बबुआ आ गया है। वह ऐसे करता है (भाषण शुरू करने से पहले आस्तीन चढा़ने की राहुल शैली की नकल उतारते हुए)। ' यादव ने कहा, ' तुमको मालूम क्या है ? कोई कागज पर लिख कर दे देता है और तुम पढ़ देते हो। तुम्हें तो उठाकर गंगा में फेंक द...
Sorry Anamika we are english spoken and very not well versed in Hindi
ReplyDeleteso, report me in english