"हड़ताल विरोध जताने की एक कालविरुद्ध विधा है"
विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी बंद शायद अपने उद्देश्य में सफल रहा हो और शायद उसने बढती महंगाई पर जनता के आक्रोश को अपने पक्ष में भुनाने में आंशिक सफलता भी पायी हो किन्तु यह भी एक अटल सत्य है की जब भी आर्थिक परिस्थितियोंवश बढती महंगाई पर सरकार काबू पाने में सफल होने लगती है बस तभी एन डी ए नीत विपक्ष को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद आने लगाती है. इस बार भी ऐसा ही कुछ करने की योजना बनायीं गयी और जिसका मूर्त रूप कल देखने को मिला. महंगाई के विरुद्ध विपक्ष का "भारत बंद" कितना सफल या कितना असफल रहा, यह राजनैतिक दलों के बीच विवाद का विषय जरूर हो सकता है , लेकिन आम जनता के लिए सफलता या असफलता उसे हुई दिक्कतों के पैमाने पर ही नापी जायेगी. जिन लोगों की ट्रेन या बस या फ्लाईट रद्द हो गयी या अपने शहर में ही जरूरी काम के लिए पहुँचाना नामुमकिन हो गया उन जैसे कई लोगों के लिए ऐसा बंद या उसकी सफलता या असफलता का कोई मायने नहीं होगा. वैसे लोग जो किसी न किसी प्रकार से अपने-अपने गंतव्य पर पहुँच गए और अपनी अपनी नौकरी की उनके लिए बंद किसी प्रकार सफल भी नहीं रहा होगा किन्तू वैसे लोग जिनकी आजीविका "रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने" जैसे स्त्रोतों पर निर्भर है उनके लिए बंद किसी दुस्वप्न से कम नहीं है. बढती महंगाई चिंतनीय विषय है और उसपर विपक्ष का आवाज उठाना भी जनता को स्वीकार्य है किन्तु विरोध का ऐसा तरीका जिससे खुद जनता की ही परेशानियों में इजाफा हो कम से कम यह तो स्वीकार्य नहीं. देश के कई भागों में खासकर वहां जहाँ भाजपा या उसके सहयोगी दलों तथा वाम मोर्चे की सरकारे थी वहां सोमवार को आर्थिक गतिविधियाँ नगण्य रहीं हालाँकि राजधानी दिल्ली पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं दिखा पर आर्थिक राजधानी मुंबई की रफ़्तार धीमी हो गयी थी. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य तो बिलकुल ठप्प पड़ गए थे. हड़ताल से हुई आर्थिक क्षति का अंदाजा तो अभी बांकी है परन्तु यह काफी गंभीर होगा यह एक अटल सत्य है और इससे भी ज्यादा होगा जन्संपत्ति को हुई क्षति की क्षतिपूर्ति. और बढती महंगाई की आंच तले इस गंभीर नुक्सान की भरपाई कोढ़ में खाज जैसे तकलीफ दे रही है. बंद और हड़ताल आदि के प्रति जनता का रवैया हमेशा से पीछा छुड़ाने जैसा रहा है. अगर ऐसी घटनाओं के दिन जनता अपने घरों से बाहर नहीं निकलती तो मात्र शारीरिक हिंसा के भय से. जनता के मन में काफी क्षोभ है इस बात को लेकर की क्यों ऐसी पार्टियां आम आदमी के नाम से एक जबरदस्ती का चक्का जाम करती है जबकि नुक्सान उसी आम आदमी का होता है. भारत बंद को सफल-असफल बताने के दोनों पक्षों के दावे के बीच इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि आम जनता इस आयोजन में शामिल होने के लिए स्वेच्छा से आगे नहीं आई.क्या विपक्ष इस पर विचार करेगा कि एक ऐसे समय आम जनता उसके आयोजन में सहभागी क्यों नहीं बनी जब बढ़ती महंगाई उसे वास्तव में त्रस्त कर रही है? बल्कि बंद को सफल बनाने के लिए जो जतन किए गए उससे यही संदेश गूंजा कि महंगाई से त्रस्त जनता को विपक्ष ने और त्रस्त किया. जिस कैरोसीन को आम गरीब जनता का ईधन कहा जाता है और इसकी कीमत को लेकर राजनीति करने में एन डी ए शासित दो प्रमुख राज्य अग्रणी हैं. राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान करने में एनडीए आगे रहा है, लेकिन इसके दो राज्यों में केरोसिन पर आम आदमी से 10 फीसदी से ज्यादा का कर वसूला जा रहा है। पंजाब में अकाली दल व भाजपा की सरकार केरोसिन पर पांच फीसदी वैट के अलावा 10 फीसदी का अतिरिक्त कर वसूल रही है यानी 15 फीसदी का कर। दूसरे स्थान पर भाजपा और जनता दल (यू) वाली बिहार सरकार है। इसने तो केरोसिन पर 12.50 फीसदी का मूल्यविर्द्धत कर (वैट) लगा रखा है. जिसे एक तरफ राजनीतिक दल गरीबों का उत्पाद बता रहे हैं उसे बाहर से ले लाने पर अतिरिक्त टैक्स लगा रहे हैं। अगर राजनीतिक दलों को वाकई गरीब जनता से इतना ख्याल होता तो वे अपने-अपने राज्यों में केरोसिन पर शुल्क कम कर सकते थे. इसके बाद बढ़ती कीमतों पर विपक्षी सोच की गंभीरता का अंदाजा अपने आप लग जाता है. दरअसल अनुभव यही रहा है की बंद की सफलता राजनैतिक ताकत से ज्यादा बाहुबल और उत्पात करने की क्षमता पर निर्भर होती है, अक्सर बंद तोड़फोड़ के दर से सफल होता है. दरअसल इन बंद और हड़ताल के प्रति जनता का व्यवहार एक सनक और तिरस्कार की तरह ही रहा है. जिस पेट्रोलियम पदार्थों की बढती कीमतों का बहाना लेकर इस बंद का आवाहन किया गया था यदि याद हो तो इसकी शुरुआत इनपर से सरकारी नियंत्रण हटाने को लेकर 1996 की वाममोर्चा समर्थित देवगौड़ा सरकार ने की थी और आज की एन डी ए उर्फ़ भाजपा ने ही इस बात का प्रस्ताव किया था की इन कीमतों को बाजार के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. दरअसल राजनीतिक पार्टियाँ इस संविधानिक एवं संसदीय तंत्र की हिस्सेदार हैं और यह उनकी भी जिम्मेदारी बनती है की वे जिस बात का विरोध कर रही है उसका विकल्प भी उनके पास मौजूद होना चाहिए वर्ना जनता का भरोसा कल की ही तरह उनपर से उठ जाएगा.
विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी बंद शायद अपने उद्देश्य में सफल रहा हो और शायद उसने बढती महंगाई पर जनता के आक्रोश को अपने पक्ष में भुनाने में आंशिक सफलता भी पायी हो किन्तु यह भी एक अटल सत्य है की जब भी आर्थिक परिस्थितियोंवश बढती महंगाई पर सरकार काबू पाने में सफल होने लगती है बस तभी एन डी ए नीत विपक्ष को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद आने लगाती है. इस बार भी ऐसा ही कुछ करने की योजना बनायीं गयी और जिसका मूर्त रूप कल देखने को मिला. महंगाई के विरुद्ध विपक्ष का "भारत बंद" कितना सफल या कितना असफल रहा, यह राजनैतिक दलों के बीच विवाद का विषय जरूर हो सकता है , लेकिन आम जनता के लिए सफलता या असफलता उसे हुई दिक्कतों के पैमाने पर ही नापी जायेगी. जिन लोगों की ट्रेन या बस या फ्लाईट रद्द हो गयी या अपने शहर में ही जरूरी काम के लिए पहुँचाना नामुमकिन हो गया उन जैसे कई लोगों के लिए ऐसा बंद या उसकी सफलता या असफलता का कोई मायने नहीं होगा. वैसे लोग जो किसी न किसी प्रकार से अपने-अपने गंतव्य पर पहुँच गए और अपनी अपनी नौकरी की उनके लिए बंद किसी प्रकार सफल भी नहीं रहा होगा किन्तू वैसे लोग जिनकी आजीविका "रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने" जैसे स्त्रोतों पर निर्भर है उनके लिए बंद किसी दुस्वप्न से कम नहीं है. बढती महंगाई चिंतनीय विषय है और उसपर विपक्ष का आवाज उठाना भी जनता को स्वीकार्य है किन्तु विरोध का ऐसा तरीका जिससे खुद जनता की ही परेशानियों में इजाफा हो कम से कम यह तो स्वीकार्य नहीं. देश के कई भागों में खासकर वहां जहाँ भाजपा या उसके सहयोगी दलों तथा वाम मोर्चे की सरकारे थी वहां सोमवार को आर्थिक गतिविधियाँ नगण्य रहीं हालाँकि राजधानी दिल्ली पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं दिखा पर आर्थिक राजधानी मुंबई की रफ़्तार धीमी हो गयी थी. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य तो बिलकुल ठप्प पड़ गए थे. हड़ताल से हुई आर्थिक क्षति का अंदाजा तो अभी बांकी है परन्तु यह काफी गंभीर होगा यह एक अटल सत्य है और इससे भी ज्यादा होगा जन्संपत्ति को हुई क्षति की क्षतिपूर्ति. और बढती महंगाई की आंच तले इस गंभीर नुक्सान की भरपाई कोढ़ में खाज जैसे तकलीफ दे रही है. बंद और हड़ताल आदि के प्रति जनता का रवैया हमेशा से पीछा छुड़ाने जैसा रहा है. अगर ऐसी घटनाओं के दिन जनता अपने घरों से बाहर नहीं निकलती तो मात्र शारीरिक हिंसा के भय से. जनता के मन में काफी क्षोभ है इस बात को लेकर की क्यों ऐसी पार्टियां आम आदमी के नाम से एक जबरदस्ती का चक्का जाम करती है जबकि नुक्सान उसी आम आदमी का होता है. भारत बंद को सफल-असफल बताने के दोनों पक्षों के दावे के बीच इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि आम जनता इस आयोजन में शामिल होने के लिए स्वेच्छा से आगे नहीं आई.क्या विपक्ष इस पर विचार करेगा कि एक ऐसे समय आम जनता उसके आयोजन में सहभागी क्यों नहीं बनी जब बढ़ती महंगाई उसे वास्तव में त्रस्त कर रही है? बल्कि बंद को सफल बनाने के लिए जो जतन किए गए उससे यही संदेश गूंजा कि महंगाई से त्रस्त जनता को विपक्ष ने और त्रस्त किया. जिस कैरोसीन को आम गरीब जनता का ईधन कहा जाता है और इसकी कीमत को लेकर राजनीति करने में एन डी ए शासित दो प्रमुख राज्य अग्रणी हैं. राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान करने में एनडीए आगे रहा है, लेकिन इसके दो राज्यों में केरोसिन पर आम आदमी से 10 फीसदी से ज्यादा का कर वसूला जा रहा है। पंजाब में अकाली दल व भाजपा की सरकार केरोसिन पर पांच फीसदी वैट के अलावा 10 फीसदी का अतिरिक्त कर वसूल रही है यानी 15 फीसदी का कर। दूसरे स्थान पर भाजपा और जनता दल (यू) वाली बिहार सरकार है। इसने तो केरोसिन पर 12.50 फीसदी का मूल्यविर्द्धत कर (वैट) लगा रखा है. जिसे एक तरफ राजनीतिक दल गरीबों का उत्पाद बता रहे हैं उसे बाहर से ले लाने पर अतिरिक्त टैक्स लगा रहे हैं। अगर राजनीतिक दलों को वाकई गरीब जनता से इतना ख्याल होता तो वे अपने-अपने राज्यों में केरोसिन पर शुल्क कम कर सकते थे. इसके बाद बढ़ती कीमतों पर विपक्षी सोच की गंभीरता का अंदाजा अपने आप लग जाता है. दरअसल अनुभव यही रहा है की बंद की सफलता राजनैतिक ताकत से ज्यादा बाहुबल और उत्पात करने की क्षमता पर निर्भर होती है, अक्सर बंद तोड़फोड़ के दर से सफल होता है. दरअसल इन बंद और हड़ताल के प्रति जनता का व्यवहार एक सनक और तिरस्कार की तरह ही रहा है. जिस पेट्रोलियम पदार्थों की बढती कीमतों का बहाना लेकर इस बंद का आवाहन किया गया था यदि याद हो तो इसकी शुरुआत इनपर से सरकारी नियंत्रण हटाने को लेकर 1996 की वाममोर्चा समर्थित देवगौड़ा सरकार ने की थी और आज की एन डी ए उर्फ़ भाजपा ने ही इस बात का प्रस्ताव किया था की इन कीमतों को बाजार के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. दरअसल राजनीतिक पार्टियाँ इस संविधानिक एवं संसदीय तंत्र की हिस्सेदार हैं और यह उनकी भी जिम्मेदारी बनती है की वे जिस बात का विरोध कर रही है उसका विकल्प भी उनके पास मौजूद होना चाहिए वर्ना जनता का भरोसा कल की ही तरह उनपर से उठ जाएगा.
aap to ulta chor kotwal ko dante wali baat kar rahi hi , NDA ne 12 rs kg ke bhau se sugar export nahi ki thi congress ne ki thi , phir congress ne hi 30 rs kg se wapas import kiya tha aur jo aaj janta ko 40 rs ke bhau mil rahi hi ,
ReplyDelete