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छात्रों की सुरक्षा या प्रवेश परीक्षा: जरुरी क्या?


 कोरोनावायरस संक्रमण के पिछले 24 घंटों में 75,760 नए मामले सामने आ चुके हैं और पिछले 24 घंटों में 1023 लोगों की इस बीमारी से मौत हो चुकी है। पिछले 2 दिनों से कोरोना से सबसे अधिक मौतें भारत में हो रही हैं। कुल 60672 लोगों की मौत अभी तक हो चुकी है इस बीमारी से। WHO के अनुसार पिछले 23 दिनों से सबसे ज्यादा संक्रमण के मामले भारत में आ रहे हैं। ऐसी स्थिति में मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा NEET JEE का आयोजन कराना सीधे सीधे सरकार की मानसिकता पर सवाल उठाता है। सरकार अपनी तैयारी की जगह सबकुछ नौजवान छात्रों के माथे डालकर खुद किनारे हो ले रही है। क्या सेल्फ डिक्लेरेशन देने के बाद किसी को संक्रमण नहीं होगा इसकी कोई गारंटी है? या संरकार ने ऐसा कोई सिस्टम बनाया है कि बच्चों का कोविड टेस्ट करवाकर उनसे डिक्लेरेशन लिया जाए।   इस वर्ष जेईई-मेन परीक्षा के 9.53 लाख विद्यार्थी जबकि NEET के 15.97 लाख विद्यार्थी है. सवाल सिर्फ इनकी सेहत का नहीं बल्कि इनके परिवारजनों और बुजुर्गों की सेहत का भी है। इसके अलावा देशभर के कई राज्यों मेंकोविड-19 को देखते हुए अब तक बस, ट्रेन आदि के परिचालन पर रोक है. वहीं, होटल, लॉज आदि बंद हैं. जेईई के लिए परीक्षा केंद्रों की संख्या 660 है जबकि नीट परीक्षा 3,843 केंद्रों पर होगी। परंतु देश के अधिकांश राज्यों में छात्रों को 50 से लेकर 500 किलोमीटर तक का सफर तय कर अपने सेंटर पर पहुंचना होगा। वह भी तब जबकि ना आने जाने का कोई साधन है ना वहां रुकने का। शायद ही कोई ऐसा छात्र होगा जिसका परीक्षा केंद्र उसके घर के पड़ोस में हो। ऐसी स्थिति में संक्रमण का खतरा और नहीं बढ़ जाता! हमारा सवाल है इतनी बेरुखी क्यों? सरकार यह क्यों नहीं बता रही कि छात्रों को परीक्षा केंद्रों पर पहुंचाने के लिए वह क्या इंतजाम करवा रही है।क्या सरकार ट्रेनें चल पाएगी या बस चलवाएगी? राज्य सरकारों से उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि केंद्र से जीएसटी का शेयर ना मिल पाने के कारण जो सरकार अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पा रही वह किस प्रकार अतिरिक्त खर्चा वहन करेगी। तो क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल उनके उद्योगपति मित्रों के लिए है? क्या सरकार सिर्फ उन्हीं के हानि लाभ के लिए जिम्मेदार है?क्या आम जनता और देश के भविष्य के कर्णधारों के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं। जब सरकार डिजिटाइजेशन की बात करती है तो फिर वह परीक्षा ना होने पर साल बर्बाद होने या कैरियर खराब होने जैसे तर्क क्यों दे रही है। विश्वव्यापी महामारी में अमेरिका इंग्लैंड जर्मनी समेत अन्य देशों ने कॉलेजों में दाखिले के लिए नए प्रयोगात्मक कदम उठाए हैं फिर भारत में परीक्षा के परंपरागत तरीके पर इतना जोर क्यों! कुल मिलाकर हमारे गले नहीं उतरता सरकार का यह रवैया। बहुमत का यह मतलब नहीं कि आपके अंदर सरकार चलाने की सलाहियत भी हो। इस सरकार के फैसलों ने शुरू से आमजन नाक में दम कर रखा है। पर इस बार बात बच्चों की है, देश के भविष्य की इसलिए कोई समझौता नहीं। हम उन हजारों करोड़ों छात्रों के साथ खड़े हैं जिनका जीवन इस सरकार की मूर्खता के कारण खतरे में है।

खतरा कितना बड़ा है इसके दो स्पष्ट उदाहरण हमारे सामने मौजूद है। सबको पता है की हरियाणा विधानसभा का 3 दिनों का सत्र बुलाया गया था परंतु कल 2 घंटे की कार्यवाही के बाद डिप्टी स्पीकर ने सत्र अनिश्चितकाल के लिए रद्द करने की घोषणा की कारण थे कोरोना के बिगड़ते हालात। हरियाणा में मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष  समेत कई मंत्री और विधायक कोरोनावायरस और इलाज में है न, जबकि विपक्ष नेता अभय चौटाला ने उपाध्यक्ष से यह कह कर सत्र चलाने की गुजारिश की कि सब लोग चार सौ 500 किलोमीटर का सफर करके आए हैं। लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। क्या सत्ताधारी नेताओं की जान के आगे आम जनता की जान की कोई कीमत नहीं।

कल ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को फटकारते हुए कहा कि अरुणा को रोकने के लिए ना तो सरकार सख्ती बरत रही है ना ही लोग नियमों का पालन कर रहे हैं तो ऐसी स्थिति में अगर सरकार ने कड़े कदम नहीं उठाए तो अदालत को निर्णय लेना पड़ेगा।

देश के अधिकांश हिस्सों में बाढ़ की विभीषिका या उसकी उत्तराई के बाद की समस्याएं पसरी हुई है। पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्व के अधिकांश राज्य अभी भी तेज बारिश और बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं। ऐसे स्थानों के अभ्यार्थियों के लिए सरकार की कोई योजना नहीं है। एक तो वैसे ही यातायात के साधन बंद है ऊपर से बाढ़ और उसकी तबाही ने आना जाना भी रोक रखा है।

सरकार को समझ नहीं आ रहा या उसे फर्क नहीं पड़ रहा यह सब कुछ हमारी समझ से परे नहीं है। मोदी सरकार की उदासीनता और हृदयहीनता बिल्कुल ही सवालों के घेरे में है।

एनटीए ने यह तो बता दिया की केंद्रों पर अभ्यार्थियों का तापमान जांच कर प्रवेश दिया जाएगा लेकिन अगर कोई परीक्षार्थी कोविड पाज़िटिव होता है या जैसा कि बहुत से मामलों में दिखा है की पॉजिटिव होने के बावजूद कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ते तो वैसी स्थिति में क्या पूरी यात्रा के दौरान वह औरों को संक्रमित करता हुआ नहीं आएगा। या जिनको पता ही ना हो वह संक्रमित है या नहीं वह किस प्रकार हलफनामा देंगे कि वह संक्रमित नहीं है क्योंकि अभी तक देश के अधिकांश हिस्सों में सबके टेस्ट तो हो नहीं पाए। उत्तर प्रदेश बिहार बंगाल मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में तो हालात इतने बुरे हैं की लोगों के मर जाने के बाद उनकी टेस्ट रिपोर्ट आती है।30000 से 35000 विद्यार्थी जो विदेशों से इस परीक्षा में शामिल होने के लिए भारत आएंगे उनके आने के बारे में भी सरकार चुपचाप बैठी है तो क्या सरकार सिर्फ अपने बही खातों में यह दर्ज कराना चाहती है कि उसने महामारी के दौर में भी देश को चलाएं रखा भले ही इस चलाने के लिए लाखों-करोड़ों छात्रों का भविष्य चौपट क्यों ना हो जाए हजारों का जीवन खतरे में क्यों ना पड़ जाए। पर सरकार तो देश चलाना है नहीं तो जीरो ईयर घोषित हो जाएगा फिर सरकार की साख का क्या होगा? विदेशों में सरकारें ऐसा नहीं सोचती। इस देश में भी ऐसा नहीं सोचा जाता था जनता पहले आती थी अर्थव्यवस्था उसके बाद। जनहित की सरकारें हुआ करती थी जो लोकहित और राज धर्म की बात करती थी। पर यह न्यू इंडिया है साहब इसको विकास करके दिखाना है। जैसे अभी तक हम डार्क एज में जी रहे थे और इस सरकार के आने के बाद नवजागरण का सूत्रपात हुआ है।


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