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शेखचिल्ली का शगूफा

आज इतने सालों बाद आत्म निर्भर भारत की बात हो रही है पर देश जब आजाद हुआ तब न घरों में बिजली होती थी, न स्वास्थ्य सेवाएं, न सड़कें और न ही उद्योग-धंधे। पं. नेहरू की सोच और प्रभावी नेतृत्व का ही नतीजा था कि देश तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ सका। देश में कल-कारखाने स्थापित हुए। बड़े-बडे़ बांध बने। आईआईटी, इसरो और एम्स जैसी संस्थाएं स्थापित हुईं। देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के विराट व्यक्तित्व, वैज्ञानिक सोच और विजन से देश आज विकास के इस मुकाम तक पहुंच सका है। जिस आधुनिक और आत्मनिर्भर भारत को हम देख रहे हैं, उसके पीछे पं. नेहरू का बड़ा योगदान है।1947 में देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद से 1964 में अपने निधन तक नेहरू ने कई संस्थाओं की शुरुआत की। इन संस्थाओं को वे आधुनिक भारत का मंदिर कहते थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रुप से ख़स्ताहाल और विभाजित हुए भारत का नवनिर्माण करना कोई आसान काम नहीं था लेकिन पंडित जी ने अपनी दूरदृष्टि और समझ से जो पंचवर्षीय योजनाएँ बनाईं उसके नतीजे वर्षों बाद मिले. साल 1950 में पंडित नेहरु ने चुनाव आयोग का गठन किया। इसके बाद देश के विकास को संचालित करने के लिए 1950 में ही उन्होंने योजना आयोग की स्थापना की। देश में विश्वस्तरीय शिक्षा मुहैया कराने के लिए 1950 में आईआईटी, 1961 में आईआईएम और 1956 में एम्स की शुरुआत की गयी। नेहरु ने 1961 में ही नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाईन बनाया था। रक्षा क्षेत्र में देश को आत्म निर्भर बनाने के लिए 1954 में उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी और 1958 में डीआरडीओ की स्थापना की। परमाणु शक्ति के लिए एटॉमिक एनर्जी कमीशन ऑफ इंडिया का गठन भी पंडित नेहरु द्वारा किया गया। अलग-अलग मोर्चे पर देश को प्रगति की दिशा में ले जाने के लिए पंडित नेहरु ने 1955 में भिलाई स्टील प्लांट की स्थापना की। नेहरू ने साल 1963 में भांख्ड़ा नांगल बांध का निर्माण कराया और 1956 में ओएनजीसी के काम की शुरुआत की गयी। इसके अलावा महशक्तियों की आपसी रंजिश से देश को बचाने के लिए उन्होंने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन चलाया। उस दौरान पत्रकारिता में आए लोग भारत का नवनिर्माण और उसके नए-नए मंदिर बन रहे थे, उनकी रिपोर्ट करते थे जैसे भाखड़ा नांगल बाँध, रिहंद बाँध, भिलाई, बोकारो इस्पात कारख़ाना आदि उनके निर्माण और आधारशिला रखने की ख़बरों की रिपोर्ट किया करते और आजकल हिंदू-मुस्लिम, मॉब-लिंचिंग, मजदूरों-किसानों की बेबसी, इसके अलावा कुछ भी रिपोर्ट नहीं होता। विजुअल मीडिया तो खैर, सरकार का माउथपीस बन चुकी है, बिल्कुल एक सधे खुर्राट चालबाज वकील की तरह जो हर दांव पेंच आजमाकर अपने मुवक्किल को कटघरे से निकाल ले जाती है। भारत को विकासशील देशों की श्रेणी में खड़ा करने का जो काम पंडित जी ने किया उससे कौन असहमत हो सकता है चाहे राजनीतिक लाभ के लिए जितना चाहे कोस लो. आई टी सेल के खिलंदड़ो को लगाकर जितने भी फोटोशॉप करवा लो, पर आज भी यह ढांचा पं० नेहरू का ही है जिसपर आप इमारतें बुलंद के ख्वाब बुन रहे हो। जब देश आजाद हुआ था तब भारत की आबादी 35 करोड़ थी और 29 ऐसे राज्य थे जो आज के यूरोपीय संघ के बराबर हैं। इनमें 122 भाषाएं एवं बोलियां थीं और सात तरह के धर्म थे। द्रविड़, आर्य तथा मंगोल जातियों की सभ्यताएं छाई हुई थीं, इसलिए ऐसे भारत के लिए एक सिस्टम का निर्माण करना था। नेहरू जी ने व्यापक लोकतांत्रिक संस्थाओं और ढांचे का निर्माण कर इसे संभव बनाया। वहीं भाषाई पहचानों को सम्मान देने के लिए वे राज्य पुनर्जन्म अधिनियम लेकर आये। छोटे किसानों को फाएदा पहुंचाने के लिए पंडित नेहरू भूमि सुधार लेकर आये। उनके शासन काल में मजदूरों को फाएदा पहुंचाने के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिनियम भी लाया गया। योजना आयोग द्वारा सोवियत माडल की पंचवर्षीय योजना को अपनाकर पहली योजना में कृषि आत्मनिर्भरता को लक्ष्य रखा गया और खेती से संबंधित हर प्रकार के सुधार हुए। पर इसी बीच में उनका ध्यान औद्योगिक विकास की तरफ भी था। उनका मानना था कि आजादी से पहले जितनी सारी चीजें विदेशों से मंगाई जाती हैं उनका निर्माण यहीं होना चाहिए और यह आत्मनिर्भर भारत की ओर पहला कदम था, जिस निमित्त उन्होंने उद्योगों को आधुनिक अर्थव्यवस्था का मंदिर मानते हुए औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948 और फिर 1956 घोषित किये। और एक ओर कृषि आधारित उद्योगों तथा कागज, सूती वस्त्र, चीनी उद्योग को प्राथमिकता दी वहीं उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था और आधारभूत संरचना के विकास पर भी ध्यान दिया। उन्होंने जिस सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की स्थापना की उसका एकमात्र उद्देश्य था कि आधारभूत संरचनाओं और उसके श्रोतों पर निजी क्षेत्र का एकाधिकार ना हो और सरकार सिर्फ अपना हिस्सा लेकर चुपचाप ना बैठ जाएं बल्कि आमजन का भी योगदान हो उन विकासशील परियोजनाओं में उनकी भी क्रयशक्ति बढ़े, रोजगार मिले और इस रास्ते से देश की जीडीपी में वृद्धि हो नाकि सारा का सारा पैसा और संसाधन चंद पूंजीपतियों की मिल्कियत बन जाए। उन्होंने सार्वजनिक क्षैत्र का विकास करके, भारी उद्यमों का विकास करके और सहकारी संपत्तियों का निर्माण करके औद्योगिकीकरण करण की प्रक्रिया को तेज करते हुए आय की असमानता को कम करने पर बल दिया। वहीं राष्ट्रीय हित की सीमा में निजी क्षेत्र के विकास को भी प्रोत्साहित किया। SIDBI, NSIC, MSME, विभिन्न औद्योगिकरण बोर्ड इसी नीति का हिस्सा थे जो आजादी के बाद के अगले 10 वर्षों में बने।इस तरह से नेहरु ने भारत का निर्माण किया। 1991 में समय की मांग पर बाजारी अर्थव्यवस्था को आकर्षित करने के लिए तत्कालीन सरकार ने विनिवेश की प्रक्रिया शुरू की जिसकी सीमा 20% थी यानि उद्देश्य यह था कि पूंजी भी आये और सरकार का मालिकाना हक भी कायम रहे अर्थात देश का लोकहितकारी स्वरूप कायम रहे लेकिन हालांकि उस दौर में भी रंगराजन समिति ने 49% और 73% विनिवेश का सुझाव दिया लेकिन कांग्रेस पार्टी की जनहितैषी नीतियों के तहत सरकार इस बात पर अडिग थी कि देश के श्रोतों पर देश की जनता का सामुहिक अधिकार हो ना कि चंद उद्योगपतियों का। फिर बीजेपी की सरकार आई और देश को यह समझाने की कोशिश की गई कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है, देश चलाना है इसलिए सरकार को सार्वजनिक कंपनियों से विनिवेश करके उनसे अलग हट जाना चाहिए और धीरे-धीरे विनिवेश की आड़ में सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपे जाने का सिस्टम बिठाया जाने लगा ताकि इसके राजनीतिक लाभ लिए जा सके। वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान देश में निजीकरण को उस रफ़्तार तक बढ़ाया गया जहां से वापसी की कोई गुंजाइश नहीं बची. वाजपेयी की इस रणनीति के पीछे कॉर्पोरेट समूहों की बीजेपी से सांठगांठ रही होगी।वाजपेयी ने 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक अनोखा मंत्रालय का गठन किया था. इसके मंत्री अरुण शौरी बनाए गए थे. शौरी के मंत्रालय ने वाजपेयी जी के नेतृत्व में भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान ज़िंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी. इतना ही नहीं वाजपेयी से पहले देश में बीमा का क्षेत्र सरकारी कंपनियों के हवाले ही था, लेकिन वाजपेयी सरकार ने इसमें विदेशी निवेश के रास्ते खोले. उन्होंने बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा को 26 फ़ीसदी तक किया था, जिसे 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने बढ़ाकर 49 फ़ीसदी तक कर दिया. इस निजीकरण से कंपनियों ने मुनाफ़े को ही अपना उद्देश्य बना लिया. हालांकि, बाज़ार के दख़ल के हरकारे लगाने वालों के लिए इससे लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलनी शुरू हुईं लेकिन इन सेक्टर में काम करने वालों के लिए ये बदलाव मुफ़ीद नहीं रहा. इंडियन पेट्रोकेमिकल कॉरपोरेशन (आईपीसीएल) और हिंदुस्तान जिंक का स्वामित्व निजी समूह के पास गया। भारतीय पर्यटन विकास निगम के काफी सारे होटलों का मालिकाना हक भी बदला गया। कुल मिलाकर यह तय हो गया कि भारत की अधिकांश जनता मजदूर बनकर काम करें और आज जैसी किसी आपदा की आपात स्थिति में या तो हालातों का शिकार हो या फिर सरकारी खैरात की बाट जोहती रहे। वर्तमान सरकार ने BPCL, Shipping Corporation, Concor, टिहरी हाईड्रो, NEEPCO जैसी लाभ दे रही सार्वजनिक कंपनियों के 100% विनिवेश या निजीकरण का लक्ष्य रखा है जिससे 31 मार्च 2020 तक 1.05 ट्रिलियन रूपये का विनिवेश सरकार को पाना था। अब जबकि ये सारी संपत्ति देश के करदाताओं और देश के संसाधनों के गाड़ी कमाई से तैयार हुए तो सब कुछ बेच बाचकर किस आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं। पकौड़े बेचने की ताकि कुछ लोग मौज लें और बांकी सारे अपना अपना सोच लें। यही है हकीकत जहां पर कहने कहने को बहुत कुछ है पर सरकार जिम्मेदारी नहीं लेगी, बस। यात्री अपने सामान की सुरक्षा खुद करें। आत्मनिर्भरता किसे कहेंगे आप। यदि स्टार्ट अप कर भी लिया तो कच्चे माल के लिए इंपोर्ट करो। पिछले कई सालों से यही तो हो रहा था। तभी तो इस लाकडाउन ने हकीकत खोलकर रख दी है। भारत के उद्योग मात्र असेम्बलिंग यूनिट्स बनकर रह गये हैं क्योंकि कुटीर और लघु उद्योगों को बचाने की सरकार की कोई मंशा नहीं है और बड़े उद्योग, जोकि निजी हाथों में हैं वे अपनी कम लागत पहले देखेंगे और इसलिए खुद निर्माण करने की बजाय कलपुर्जे आयात कर असेम्बलिंग यूनिट्स की तरह काम कर रहे हैं। इसलिए बगैर जमीनी हकीकत के हवाई किले बनाने का कोई लाभ नहीं बस अच्छे दिखेंगे, बालीवुड के सेट्स की तरह पर स्थाई कुछ भी नहीं।

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