कोरोनावायरस से उपजे विशाल जन स्वास्थ्य समस्या के बीच हम एक और बड़ी विपदा से नमूदार हो रहे हैं वह है मालिकों द्वारा अपने कामगारों को अधर में छोड़ दिया जाना और उससे भी परे सरकारों द्वारा इस ओर बिल्कुल भी ध्यान ना देना। आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 का दुरुपयोग करते हुए कामगारों के घर लौटने के अधिकार को रोक दिया गया है और उनके भोजन आवास और चिकित्सा सुविधा को लेकर किसी प्रकार का कोई प्रबंध नहीं दीख रहा है। यहां तक कि राज्यों द्वारा घोषित भोजन और नकदी की राहत भी अधिकांश कामगारों तक नहीं पहुंच रही है।
भुखमरी से शुरू हुई या समस्या लाखों लाख मजदूरों के पैदल घर लौटने तक जा पहुंची है। इनमें से बहुत लोग रास्तों में ही कॉल कल वित हो जा रहे हैं। 1 महीने से ज्यादा बीत चुके हैं लेकिन केंद्र सरकार ने इन मजदूरों को घर लौटने से संबंधित और स्पष्ट आदेश जारी किए हैं। मालिक और मालिकों के संग इकट्ठा होकर जहां-तहां अनुचित दबाव का प्रयोग कर इन्हें वापस लौटने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार भी यात्रा सुविधाओं में देरी कर इन मालिकों के लिए मजदूरों की अबाधित आपूर्ति सुनिश्चित करने का भरसक प्रयास कर रही है।
उद्योगपति अब श्रम कानूनों को संशोधित करने या करवाने का प्रयास कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकारों ने इस हेतु अध्यादेश जारी किए हैं जिनमें इस बात का जिक्र है की मातृत्व सुविधाओं एवं ग्रेच्युटी संबंधी नियमो, कारखाना अधिनियम 1946, न्यूनतम मजदूरी एक्ट 1948, औद्योगिक प्रशासन एक्ट 1946 और ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 से संबंधित विधिक प्रावधानों को ताक पर रख दिया जाए। कई राज्यों ने उद्योगों को ऐसे विधिक प्रावधानों का पालन करने से छूट दे रखी है। भारतीय उद्योगों के परिसंघ सीआईआई ने सलाह दी है कि 12 घंटों की वर्किंग शिफ्ट बनाई जाए और सरकार ने इस बात के निर्देश भी जारी कर दिए हैं की कामगार ड्यूटी ज्वाइन करें अन्यथा दंडात्मक कार्यवाही झेलने को तैयार रहें।
इस प्रकार पूंजीपति रोजगार दाता चाहते हैं की असंगठित कामगारों को संगठित तौर पर दरकिनार करने के बाद अब सरकार हस्तक्षेप की नीति को फिर से लागू करें और संगठित क्षेत्र के लिए भी ठेका प्रथा को लागू कर दिया जाए। अगर ऐसा होता है तो यह संसद द्वारा संगठित श्रम के लिए प्रदान किए गए सुरक्षात्मक ढांचे को छीन लेगा।
ठेकेदारी प्रथा की वापसी की यह पूरी कवायद याद दिलाती है बंगाल रेगुलेशन एक्ट 1819 कि जिसे आसाम के गोरे चाय बागान मालिकों के लाभ के लिए तैयार किया गया था। इसके प्रावधानों में मजदूरों का 5 वर्ष तक का अनुबंध और इसे तोड़ने पर कठोर सजा शामिल थी। बाद में स्थानीय श्रमिक यातायात अधिनियम 1813 सेठ को भी बंगाल में लागू किया गया जिसने की पूंजीपति रोजगार प्रदाताओं को कठोरता पूर्ण नियंत्रण की चाबी दे दी और यहां तक की उन्हें मजदूरों को उनके रोजगार वाले जिले में 6 महीने तक बलात रोके रखने का भी अधिकार दे दिया गया। 18 सो 65 के बंगाल एक्ट ने इन मजदूरों को काम छोड़कर जाने से रोकने तथा उन्हें बागानों में फिर से वापस भेजने के लिए विशेष प्रवासन पुलिस भी लगाने की इजाजत दे दी। आज जो हम देख रहे हैं यह 150 साल पुराने ब्रिटिश भारत से भयावह साम्यता लिए हुए हैं।
कारखाना मजदूरों ने भी शोषण की इंतहा देखी थी और 16 घंटे प्रतिदिन के कार्य घंटों का काला समय झेला था। उनके आंदोलनों ने कारखाना अधिनियम 1911 को जन्म दिया जिसके अंदर 12 घंटे की कार्य सेफ्टी शुरू हुई। हालांकि न्यूनतम मजदूरी बलात वेतन कटौती और निकृष्ट कार्यस्थल स्थिति तथा बंधुआ मजदूरी जैसे हालात अब तब भी जारी थी। भारत में श्रम कानून दरअसल श्रमिकों के उस संघर्ष की कथा है जिसे उन्होंने दमनकारी औपनिवेशिक उद्योगपतियों के विरुद्ध जी जान से लड़ा था। उनके इस संघर्ष को तत्कालीन बड़े राजनीतिज्ञों का सहारा मिला। सन् 1920 में बेहतर कार्य परिस्थितियों के लिए हड़तालों और आंदोलनों का एक बड़ा दौर चला और बहुत सारे मजदूर नेताओं की भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तारियां भी हुईं। हमारे नेताओं के साथ देने और उनके लगातार दवाब डालने के परिणामस्वरूप रॉयल कमीशन ऑन लेबर गठित हुआ जिसने 1935 में अपनी रिपोर्ट दी तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 के अन्तर्गत मजदूरों को विधि निर्माण में ज्यादा भागीदारी का मौका दिया और जिसकी वजह से सुधारों का एक दौर शुरू हुआ जो आज के श्रमिक कानूनों की परिणति के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।
प्रजातांत्रिक संसदीय कार्य प्रणाली में संसद के सहयोग से श्रमिकों की एवं उनके अधिकारों की सुरक्षा करने का प्रावधान है। कारखाना एक्ट के द्वारा 8 घंटे की वर्किंग शिफ्ट, ओवरटाइम, साप्ताहिक छुट्टी, सवैतनिक अवकाश, स्वास्थ्य सफाई एवं सुरक्षा से संबंधित उपाय सुनिश्चित किए गए। वहीं औद्योगिक विवाद अधिनियम कामगारों के मजदूरी एवं अन्य विवादों को बातचीत के द्वारा निपटाए जाने और उस बातचीत में मजदूरों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित किए जाने को तय किया गया ताकि अन्याय पूर्ण छटनी एवं बर्खास्तगी को रोका जा सके। इन प्रावधानों को बाद में राज्य के नीति निर्देशक तत्व और संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 के अंतर्गत जीवन के अधिकार तथा शोषण के विरुद्ध अधिकारों में भी शामिल किया गया। ट्रेड यूनियनों ने कामगारों के जीवन स्तर को उन्नत बनाने तथा उन्हें सम्मानजनक जीवन देने में भी महती भूमिका निभाई थी।
शायद इस सरकार को याद ना हो लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1983 में ग्लैक्सो लैबोरेट्रीज वाले मामले में औद्योगिक रोजगार अधिनियम 1946 को परिभाषित करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया था कि मजदूर सिर्फ हायर एंड फायर के लिए नहीं बने जैसा कि अहस्तक्षेप नीति के दिनों में सरकारें करती थी। सामाजिक न्याय और सामाजिक आर्थिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि वह मजदूर जो कि पूंजी के निर्माण में अपने हनुमान और शोणित का योगदान करते हैं उनको यूं ही अलग-थलग छोड़ दिया जाए। अनुबंध दो असमान लोगों के बीच सिर्फ मोलभाव करने के लिए नहीं अपितु उसे संवैधानिक रूप से लागू करने की भी इजाजत देता है।
अब इन कानूनों में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ कामगारों को सदियों पीछे धकेल देगी इसीलिए संसद में इन कानूनों को किसी भी प्रकार से संशोधित करने अथवा इनमें छूट देने की इजाजत नहीं देती क्योंकि संविधान निर्माताओं को पता था कि ऐसा कोई भी प्रावधान ढके छुपे तौर पर शोषण को जन्म देगा। यहां तक कि कारखाना अधिनियम का सेक्शन 5 भी लोक आपातकाल के दौरान ही राज्य को ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने की इजाजत देता है। लोक आपातकाल को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि ऐसी भयानक स्थिति जिसमें की भारत के भूभाग या उसके किसी क्षेत्र में देश की संप्रभुता एवं अखंडता को किसी भी प्रकार का खतरा होने की स्थिति में चाहे वह युद्ध अथवा आंतरिक कलह या बाह्य आक्रमण की वजह से पैदाइश स्थिति हो। जहां तक मेरा मानना है अभी देश की सुरक्षा को ऐसा कोई भी खतरा आसन्न प्रतीत हो रहा है। कार्य घंटों में या छुट्टियों में ऐसा कोई भी परिवर्तन सार्वजनिक संस्थानों के लिए भी लागू नहीं किया जा सकता। औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 36 बी भी सरकार को ऐसे अधिकार सिर्फ जांच अथवा मामले के समाधान के दौरान ही दे सकती है।
तो यह स्पष्ट है कि राज्य सरकारों के इन आदेशों को किसी भी प्रकार का विधिक समर्थन प्राप्त नहीं है। श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची का विषय है और श्रम कानूनों से संबंधित अधिकांश प्रावधान केंद्र सरकार द्वारा किए गए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है श्रम कानूनों के कोई भी प्रावधान अगले 3 सालों तक लागू नहीं होंगे। यहां तक कि प्रवासी श्रमिकों के आधारभूत मानवाधिकार, न्यूनतम मजदूरी, मातृत्व लाभ एवं ग्रेच्युटी इत्यादि भी निलंबित कर दिए जाएंगे। कैसे कोई राज्य सरकार, केंद्र के प्रावधानों को अपने आप शून्य कर सकती है। संविधान में भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि मात्र राष्ट्रपति के अनुमोदन से ऐसे राज्य अध्यादेशों को लागू किया जाए जिसके द्वारा समुचित तत्संबंधी विधि के अभाव में भी, संसदीय प्रावधानों कोही रोक दिया जाए।
लगभग सारे श्रम अनुबंध कानून सम्मत और विधि पालित ही है यहां तक कि विवाद समाधान के मामलों में भी दिए गए निर्णय प्रजातांत्रिक रूप से श्रमिक समानता का पालन करते हुए ही दिए जाते हैं। ऐसी प्रक्रियाएं ही देश का विकास सुनिश्चित करती हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन बीमा निगम 1980 के मामले में या स्पष्ट किया था की सेवा शर्तों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन सिर्फ बातचीत की प्रजातांत्रिक प्रक्रिया और विधि द्वारा ही हो सकता है। तत्कालीन केंद्र सरकार के बोनस को एक रूप से मना करने वाले मामले में माननीय न्यायालय ने कहा था कि मौलिक गलतियां केवल और सिर्फ केवल मौलिक मूल्यों को याद करके ही सुधारी जा सकती हैं अन्यथा सिर्फ और सिर्फ अराजकता और कानून का अभाव ही नजर आएगा।
राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए आदेश और अध्यादेश इन निर्णयों की आलोक में पूर्णता प्रजातांत्रिक और असंवैधानिक हैं। श्रम के मौजूदा प्रावधानों को ही जारी रखा जाना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की वैश्विक निगमों का उद्भव भी औपनिवेशिक साधनों और स्वतंत्रता के पश्चात उसी विरासत को धोते हुए हुआ है। ऐसी औपनिवेशिक विचारधारा का पुनर्जागरण ना सिर्फ समाज के लिए खतरा है बल्कि लाखों-करोड़ों कामगारों तथा उनके परिवारों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को ताक पर रख देगा। श्रम और पूंजी के बीच ऐसे असमान मोलभाव की शक्ति सिर्फ पूंजीवाद को जन्म दे सकती है और श्रम के सम्मान की धारणा को मटिया मेट कर सकती है। सरकार की यह नैतिक एवं संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह कार्य के लिए न्याय संगत एवं मानवीय परिस्थितियों को सुनिश्चित करें तथा मातृत्व लाभ, ग्रेच्युटी, तथा श्रमिकों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को आर्थिक आवश्यकता के दबाव में नजरअंदाज न करें। श्रम कानूनों को इसीलिए सभ्य समाज का सूचक माना जाता है और इन्हें मात्र विश्वव्यापी महामारी के बहाने से दरकिनार नहीं कर दिया जा सकता।
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