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भारत में बढती भुखमरी की वजहें


हर रात, पृथ्वी पर हर सात में से एक व्यक्ति भूखा सोता है। जैसा कि कोविड -19 महामारी ने गरीबी और भूख के संकट को बढ़ा दिया है, भारत में स्थिति विशेष रूप से गंभीर दिखती है। दुनिया भर में भुखमरी की स्थिति पर आंकडे प्रकाशित करने वाली संस्था ग्लोबल हंगर इंडेक्स(जीएचआई) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारत में भूख के सतर को खतरनाक बताया है। इंडेक्स द्वारा जारी साल 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक भुखमरी के मोर्चे पर भारत की हालत उसके पउोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी खराब है। जीएचआई द्वारा 116 देशों पर किए गए अध्ययन में भारत को 101वें स्थान पर रखा गया है। जबकि साल 2020 में 107 देशों में भारत 94वें स्थान पर था। चीन, ब्राजील, और कुवैत सहित अठारह देशों ने भूख से निपटने के मामले में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है। भारत ने इंडेक्स द्वारा जारी रैंकिंग पर आपत्ति प्रकट करते हुए इसकी कार्यप्रणाली को अवैज्ञानिक करार दिया है। जीएचआई रिपोर्ट प्रत्येक साल अक्टूबर महीने में जारी की जाती है। 


यह सूचकांक राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तरों पर 2030 तक शून्य भूख की दिशा में प्रगति को मापने के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रमुख संकेतकों की निगरानी करता है। चार संकेतकों- अल्पपोषण, बच्चे की बर्बादी, बाल स्टंटिंग और बाल मृत्यु दर- के मूल्यों के आधार पर - जीएचआई 100-बिंदु पैमाने पर भूख का निर्धारण करता है, जहां 0 सबसे अच्छा संभव स्कोर (भूख नहीं) और 100 सबसे खराब है। प्रत्येक देश के जीएचआई स्कोर को गंभीरता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, निम्न से लेकर अत्यंत खतरनाक तक।

आयरलैंड और जर्मनी की प्रतिष्ठित संस्था द्वारा प्रति वर्ष जारी की जाने वाली रिपोर्ट में पडोसी देश म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान भी खतरनाक भूख वाले देशों ने अपने नागरिकों को भोजन देने में बेहतर प्रदर्शन किया है। जीएचआई के आंकडों पर गौर करें तो भारत में 2015 के बाद भुखमरी लगातार बढ रही है। साल 2015 में भारत 93वें, 2016 में 97वें, 2017 में 100वें, 2018 में 103वें, और 2019 में 102वें स्थान पर रहा था। साल 2020 में स्थिति कुछ सुधरी और भारत 94वें स्थान पर रहा है। लेकिन साल 2021 की स्थिति एक बार फिर से शर्मशार कर रही है।
पिछले 20 वर्षों में, भारत में खाद्यान्न उत्पादन 198 मिलियन टन से बढ़कर 269 मिलियन टन हो गया है। आदर्श रूप से, यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि कोई भी भोजन तक पहुंच के बिना न जाए। इसके अलावा, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 का उद्देश्य देश के दो-तिहाई हिस्से को रियायती दरों पर खाद्य और पोषण सुरक्षा प्रदान करना है। यह अपने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत 75% ग्रामीण आबादी और 50% शहरी आबादी को कवर करता है।

फिर ऐसा क्यों है कि भारत अभी भी भूख से जूझ रहा है? ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम(एनएफएसए), खाद्य सुरक्षा योजना, अंत्योदय अन्न योजना, अन्नपूर्णा योजना और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना जैसी देशव्यापी योाजनाओं के बावजूद भुखमरी के साथ संघर्ष में अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं की राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर चलने वाली इन योजनाओं का लाभ आदिवासियों, दलितों और वंचित समुदाय के लोगों तक पहुंच ही नहीं पा रहा हो। कोरोना के दौरान भारत सरकार तथाकथित दुनिया के सबसे बडे मुफ्त राशन वितरण (प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना) कार्यक्रम का बीते एक साल से संचालन कर रही है। इसके बावजूद इंडेक्स में 7 पायदान (94 से 101) नीचे खिसकना यह दिखाता है कि सबका साथ और सबका विकास का नारा देने वाली नरेंद्र मोदी सरकार के खाद्यान्न वितरण की योजना बेहतर परिणाम दे पाने में सफल साबित नहीं हो पाई है। हालांकि, देश में भूख की एक बडी वजह प्रोडक्शनण् प्रोसेसिंग और कंजप्शन को भी कहा जा सकता है। कुशल प्रबंधन और बेहतर रख-रखावके अभाव में देश में प्रतिवर्ष लाखें टन खाद्य निगम के गोदामें में अनाज सड़ जाता है। बड़ी मात्रा में अनाज की बर्बादी पर देश की सर्वोच्च अदालत ने भी चिंता प्रकट की है। अदालत का मानना है कि जिस देश में हजारों लोग भूखे मर रहे हों, वहां अन्न के एक दाने की बर्बादी भी अपराध है। सर्वोच्च अदालत का तो यह भी कहना है कि अनाज सड़ने के बजाए केंद्र सरकार गरीब और भूखे लोगों तक इसकी आपूर्ति सुनिश्चित करें। यह भी याद रखना चाहिए कि भूख कुपोषण का एक पहलू है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा भले ही भूखा न हो, लेकिन फिर भी विविधता के मामले में उसके पास पर्याप्त आहार नहीं हो सकता है। जो लोग सिर्फ चावल खाकर भरपेट भोजन करते हैं, उन्हें भले ही भूख न लगे, लेकिन उनमें कई पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।

पांच साल से कम उम्र के बच्चों के बीच तीव्र कुपोषण को दर्शाते हुए, सभी 116 देशों में भारत को बाल कुपोषण में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2010-2014 में 15.1% से बढ़कर 2016-2020 में 17.3% तक बाल कुपोषण में वृद्धि हुई है। इस बीच, भारत में बाल मृत्यु दर 2012 में 5.2% से घटकर 2021 में 3.4% हो गई है। भारत की स्थिति अब अपने पड़ोसी देशों - पाकिस्तान (92), बांग्लादेश (76) और नेपाल (76) से पीछे है।

खाद्य असुरक्षा के बढ़ते स्तर का भारत में बच्चों के स्वास्थ्य परिणामों पर घातक दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम में कहा गया है कि कुपोषण का पीढ़ी दर पीढ़ी प्रभाव पड़ता है। कुपोषित माताओं में उन बच्चों को जन्म देने की संभावना अधिक होती है जो कम वजन वाले या कम वजन के होते हैं। इतना ही नहीं, जीवन के पहले 1,000 दिनों में पर्याप्त पोषण बच्चे के स्वास्थ्य के लिए उसके पूरे जीवन काल को निर्धारित करने के लिए एक महत्वपूर्ण खिड़की है। इसलिए, जब एक न्यूनतम पर्याप्त आहार तक पहुंच पूरी नहीं होती है, तो इसका सबसे कमजोर लोगों के पोषण पर तत्काल प्रभाव पड़ता है।

गरीबी और अकाल में नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. अमर्त्य सेन ने भुखमरी का श्रेय भोजन की उपलब्धता में गिरावट के बजाय कई अन्य कारकों को दिया है। वह अकाल का अध्ययन करने के लिए विनिमय अधिकारों की विफलता का उपयोग करते है। हम भारत में भूख संकट की व्याख्या करने के लिए इस सिद्धांत को लागू कर सकते हैं। सेन का तर्क है कि प्रत्येक व्यक्ति को वस्तुओं और सेवाओं के सभी संभावित संयोजनों का हकदार माना जाता है जो कि सुलभ हैं। किसी की पात्रता एक वैकल्पिक बंडल है जिसे कोई भी व्यक्ति चुनने के लिए स्वतंत्र है। बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव, नए राशन कानूनों के कार्यान्वयन, या वितरण प्रणालियों में बदलाव जैसे कई कारकों के कारण यह पात्रता बदल सकती है। इसमें कई कारक योगदान कर सकते हैं और हम देखते हैं कि सरकारी नीतियों के कार्यान्वयन से भी ऐसी पात्रता विफलताएं होती हैं।

एक, दो डॉलर प्रतिदिन से कम आय वाले गरीबों की संख्या पिछले एक वर्ष में दोगुनी से अधिक हो गई है। विश्व बैंक का अनुमान है कि महामारी प्रेरित मंदी के कारण यह संख्या 75 मिलियन बढ़ गई है। स्वाभाविक रूप से, गरीबों ने अधिक महंगे भोजन का सेवन करना बंद कर दिया है, जो अपेक्षाकृत पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इससे भारत में कुपोषण का संकट और गहराने की संभावना है। बाजार में भोजन की प्रचुरता भूख मिटाने के लिए पर्याप्त नहीं है जब तक कि लोगों के पास आवश्यक क्रय शक्ति न हो।



दूसरा, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की जवाबदेही पहल से पता चलता है कि एकीकृत बाल विकास सेवाओं के लिए कुल आवंटित धन का केवल 44%, जिसके अधिदेश में छह साल से कम उम्र के बच्चों को पोषण भोजन प्रदान करना शामिल है, का उपयोग 2018-19 में किया गया था।

इसके अलावा, 2018-19 में बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन योजना के लिए आवंटित कुल धनराशि में से, भारत में केवल 14 राज्यों ने पूरी तरह से धन का उपयोग किया। अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज के निष्कर्षों के आधार पर, यह मुद्दा एक और मोड़ लेता है। उनके अनुमान, जो मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हैं, बताते हैं कि 2014 और 2021 के बीच मध्याह्न भोजन योजना के आवंटन में 32.3 प्रतिशत की कमी आई है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली 2020 में लॉकडाउन के बाद से लाखों लोगों के लिए एक जीवन रेखा साबित हुई है, लेकिन इसके राष्ट्रीय कवरेज को लेकर अभी भी चिंताएं हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुसार, कुल जनसंख्या का 67 प्रतिशत सार्वजनिक वितरण प्रणाली में शामिल किया जाना चाहिए। जब हम आज इसे आबादी पर लागू करते हैं, तो कम से कम 90 करोड़ लोगों को कवर किया जाना चाहिए। हालाँकि, वास्तविकता यह है कि इसमें केवल 80 करोड़ लोग शामिल हैं, जो भारत में कुल जनसंख्या का सिर्फ 59% है। डेटा यह भी बताता है कि 5.1 करोड़ लोगों को सीमित कवरेज मिल रही है और 40 करोड़ लोग पूरी तरह से सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बाहर हैं।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाईजेनशन(एफएओ) के अनुसार पूरी दुनिया से पैदा होने वाला 33 प्रतिशत भोजन जरूरतमंदों किे पास पहुंच ही नहीं पाता। 45 प्रतिशत फल और सब्जियां, 30 प्रतिशत अनाज, 35 प्रतिशत सीफूड और 20 प्रतिात दूध के उत्पाद लोगों की भूख मिटाने के काम नहीं आ पाते और बर्बाद हो जाते हैं। अनुमार के अनुसार पूरी दुनिया में बर्बाद हो जाने वाले भोजन का 25 प्रतिशत भी यदि बचा लिया जाए तो दुनियाभर में करीब 82 करोड लोगों का पेट भर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में हर साल बर्बाद होने वाले भोजन का वजन 130 करोड़ टन से ज्यादा है। विकसित देशें लगभग 47 लाख करोड़ रूपये की कीमत का और विकासशील देशें लगभग 22 लाख करोड़ रूपए का भेजन हर साल बर्बा कर दिया जाता है। कमोबेश ऐसी ही स्थिति हमारे यहां भी है। फरवरी 2021 में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की रिपोर्ट यूएन फूड़ वेस्ट इंडेक्स 2021 के अनुसार भारत में हर साल प्रति व्यक्ति लगभग 50 किलो तैयार भेजन की बर्बादी हो रही है। 2 फरवरी 2021 को लोकसभा में पूदे गए एक सवाल के जवाब में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग में बताया कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामें में वर्ष 2017 से 2020 के बीच 11,520 टन अनाज सड़ गया।

भारत में इस तरह की पात्रता विफलताओं के कारण खाद्य असुरक्षा एक खतरनाक मुद्दा बना हुआ है। जबकि सरकार ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स के निष्कर्षों को "अवैज्ञानिक" के रूप में खारिज कर दिया है, हम निराशाजनक जमीनी वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।


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